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Dharamkira
ऊँचे बुग्याल के शांत तालाब में प्रतिबिंबित चौखंबा के हिमशिखर

ध्यान — स्थिर मन

ध्यान

परम्परा की अपनी साधनाएँ — पहली गहरी साँस से दीप-शिखा तक — सरल व्याख्या, कोमल मार्गदर्शन, और सुरक्षा पर पूरी ईमानदारी के साथ।

चित्र: Abhishek GhoshCC BY-SA 4.0CC BY-SA 4.0

यहाँ सब पारम्परिक साधना है, ईमानदारी से समझाई गई — चिकित्सा-परामर्श नहीं। गर्भावस्था, हृदय, रक्तचाप, नेत्र या मिर्गी की स्थिति में पहले हर अभ्यास की सावधानी पढ़ें, और आपके चिकित्सक व सच्चे गुरु की बात इस पृष्ठ से ऊपर रहे।

ये शब्द नए हैं?
ध्यान
ध्यान — मन को एक शांत आधार देना, जैसे साँस, लौ या मंत्र।
प्राणायाम
श्वास के अभ्यास — साँस को धीमा और सधा हुआ करना, क्योंकि शांत साँस से मन शांत होता है।
प्राण
वह जीवन-ऊर्जा जो परम्परा के अनुसार साँस पर चलती है — प्राणायाम इसी की देखभाल है।
कुम्भक
साँस को क्षण भर भीतर या बाहर कोमलता से रोकना — एक उन्नत चरण, जो गुरु से सीखा जाता है।
षट्कर्म
हठयोग की छह शुद्धि-क्रियाएँ; त्राटक (दीप-दर्शन) और कपालभाति इन्हीं में से हैं।
त्राटक
एक बिन्दु — प्रायः लौ — पर स्थिर, कोमल दृष्टि, जब तक मन भी आँखों जैसा स्थिर न हो जाए।
मुद्रा
अर्थपूर्ण हस्त-संकेत — जैसे चिन मुद्रा: ध्यान में अँगूठे और तर्जनी के सिरे मिलाकर रखना।
साधना
आपका नियमित आध्यात्मिक अभ्यास — जप, ध्यान, योग और पूजा जो आप सचमुच रोज़ करते हैं।

श्वास — प्राणायाम

साँस मन की वह पकड़ है जो हर हाथ में पहले से है। ये अभ्यास — सरल दीर्घ श्वास से भ्रामरी तक — उसे धीमा और सम करते हैं, और मन उसके पीछे ठहर जाता है।

गहरी साँस (दीर्घ श्वास)

दीर्घ श्वास

सबसे पहला अभ्यास: धीमी, पूरी साँसें जो पूरे शरीर को शांत करती हैं।

समवृत्ति — समान साँस

समवृत्ति प्राणायाम

चार गिनती भीतर, चार रोकें, चार बाहर, चार खाली — एक चौकोर, स्थिर करने वाली साँस।

भ्रामरी — भौंरे की गूँज

भ्रामरी प्राणायाम

साँस को कोमल गूँज बनाकर छोड़ें और उसे पूरे सिर में गूँजता अनुभव करें।

शीतली — शीतल साँस

शीतली प्राणायाम

मुड़ी जीभ पर से हवा पीजिए और भीतर से ठंडक अनुभव कीजिए — दुबई की गर्मी की सच्ची मित्र।

शीतकारी प्राणायाम

शीतकारी

जिनकी जीभ नहीं मुड़ती उनके लिए शीतली की बहन — दाँतों पर से 'सीत्' के साथ ठंडी हवा पीजिए।

नाड़ी शोधन (अनुलोम-विलोम)

नाड़ी शोधन

बारी-बारी नथुनों से साँस — भारत का सबसे प्रिय प्राणायाम, बाएँ-दाएँ का संतुलन।

उज्जायी — सागर-श्वास

उज्जायी प्राणायाम

गले की हल्की सरसराहट हर साँस को एक सुनाई देती लहर बना देती है।

सूर्य भेदन प्राणायाम

सूर्य भेदन

दाएँ नथुने से भीतर, बाएँ से बाहर — उष्णता, क्षुधा और उद्यम की साँस।

चन्द्र भेदन प्राणायाम

चन्द्र भेदन

बाएँ नथुने से भीतर, दाएँ से बाहर — शीतलता, कोमलता और निद्रा की साँस।

कपालभाति

कपालभाति

पेट से छोटी, तेज़ साँसें बाहर फेंकना — एक प्रबल शुद्धि-क्रिया, जो प्रत्यक्ष सीखी जानी चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका

समान, सशक्त श्वास-प्रश्वास जो भीतर की अग्नि धधकाते हैं — हमारा सबसे प्रबल प्राणायाम।

दृष्टि — त्राटक

आँखें स्थिर हों तो मन भी स्थिर होता है। हठयोग की शुद्धि-क्रिया त्राटक वह एकाग्रता है जिसका अभ्यास आज रात एक लौ से हो सकता है।

नाद — मंत्र

स्थिरता को धारण करता नाद: तीन भागों वाला ॐ, और सोऽहम् — वह मंत्र जो साँस पहले से फुसफुसा रही है।

ॐ ध्यान — ओंकार जप

ॐ ध्यान

एक अक्षर, तीन ध्वनियाँ, और उनके बाद की नीरवता — वह ध्यान जहाँ से उपनिषद् आरम्भ होते हैं।

लिखित जप

लिखित जप

नाम गिनिए नहीं, लिखिए — एक पूरी कॉपी धीरे-धीरे राम या ॐ से भरती हुई।

चंक्रमण जप (टहलते हुए जप)

चंक्रमण जप

कदम और अक्षर एक ताल में बँध जाते हैं — भारतीय ढंग का चल-ध्यान, किसी भी माला-मंत्र के साथ।

सोऽहम् — साँस का अपना मंत्र

सोऽहम्

ध्यान से सुनिए: आती साँस "सो" कहती है, जाती साँस "हम्"। आप जन्म से जप कर रहे हैं।

नाम स्मरण

नाम स्मरण

गिनती से आगे: नाम दिन के नीचे यों बहता रहे जैसे पुल के नीचे नदी।

इष्ट ध्यान

इष्ट ध्यान

अपने इष्ट को हृदय में अंग-अंग गढ़िए, जब तक वह रूप पूरे मन को धारण न कर ले।

स्थिरता

पूर्ण विश्राम की साधनाएँ — लेटे हुए, भीतर से पूर्ण जाग्रत, शरीर को धरती को सौंपते हुए।

योग निद्रा

योग निद्रा

लेट जाइए, जागते रहिए, और ध्यान को धीरे-धीरे पूरे शरीर में घूमने दीजिए।

काय स्थैर्यम्

काय स्थैर्यम्

दस मिनट का एक सरल संकल्प: देह नहीं हिलेगी। फिर देखिए मन क्या करता है।

षण्मुखी मुद्रा

षण्मुखी मुद्रा

उँगलियाँ कोमलता से कान, आँखें और होंठ मूँद देती हैं — बाहर की दुनिया विदा, भीतर के नाद उपस्थित।

अन्तर् मौन

अन्तर् मौन

विचारों से लड़ना छोड़िए — पीछे बैठकर देखिए कैसे वे आते हैं, खेलते हैं, और स्वयं चले जाते हैं।

चिदाकाश धारणा

चिदाकाश धारणा

आँखें बंद कीजिए: सामने का वह अँधेरा परदा एक आकाश है। उसे वैसे देखिए जैसे रात को देखते हैं।

साक्षी भाव

साक्षी भाव

वेदान्त की मुख्य कुंजी: तुम आँधी नहीं — वह आकाश हो जिसे वह पार करती है।

स्थिरता का शारीरिक पक्ष

ध्यान उस शरीर में सबसे अच्छा बैठता है जिसने गति की हो। सूर्य नमस्कार, कोमल क्रम और आसन-मार्गदर्शिकाएँ योग खंड में हैं।

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