सीधे सामग्री पर जाएँ
Dharamkira

सभी ध्यान-साधनाएँ

नाड़ी शोधन

नाड़ी शोधन (अनुलोम-विलोम)

नाड़ी = सूक्ष्म प्रवाह-मार्ग, शोधन = शुद्धि — नाड़ियों की शुद्धि

बारी-बारी नथुनों से साँस — भारत का सबसे प्रिय प्राणायाम, बाएँ-दाएँ का संतुलन।

श्वास — प्राणायामसधा — थोड़ा अभ्यास सहायक

सबसे सरल शब्दों में

उँगली से नाक का एक छेद बंद करो और दूसरे से साँस लो। फिर दूसरी ओर से साँस छोड़ो। जैसे हवा बारी-बारी खेल रही हो — इससे मन संतुलित और शांत लगता है।

यह क्या है

एक समय में एक नथुना: बाएँ से साँस लें, दाएँ से छोड़ें; फिर दाएँ से लें, बाएँ से छोड़ें। यही बुनावट नाड़ी शोधन है — बोलचाल में अनुलोम-विलोम — वह प्राणायाम जो दादी-नानी और योगशालाएँ सबसे पहले सिखाती हैं। हठयोग प्रदीपिका इसे पहला प्राणायाम बनाती है (II.7–10) — वह जो किसी और अभ्यास से पहले नाड़ियों को शुद्ध करता है: नाड़ियाँ वे सूक्ष्म मार्ग हैं जिनमें प्राण बहता है, और नथुनों की अदला-बदली उन्हें साफ़ और संतुलित करती मानी जाती है। जो भी हो, दस धीमी आवृत्तियाँ लगभग हर किसी को शांत कर देती हैं।

स्रोत: शास्त्रीय हठयोग (हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में वर्णित); भारतीय योग-परम्पराओं में सर्वत्र सिखाया जाता है।

अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि

गर्भावस्था, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप या मिर्गी में साँस पर ज़ोर या कुम्भक कभी नहीं — धीमा, बिना-रोक रूप ही सही है। बंद नाक के दिन विश्राम का दिन है; साँस कोमल रहे, खिंचाव कभी नहीं।

अभ्यास कैसे करें

  1. सीधे बैठें। दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा हथेली की ओर मोड़ें (विष्णु मुद्रा) — अँगूठा दायाँ नथुना बंद करेगा, अनामिका बायाँ।

  2. अँगूठे से दायाँ नथुना बंद कर बाएँ से धीरे-धीरे साँस लें।

  3. बायाँ नथुना बंद करें, अँगूठा हटाएँ, और दाएँ से धीरे-धीरे साँस छोड़ें।

  4. अब दाएँ नथुने से साँस लें।

  5. दायाँ बंद करें, बायाँ खोलें, बाएँ से साँस छोड़ें। यह एक पूरी आवृत्ति हुई।

  6. साँस मौन, धीमी और सहज रहे — साँस छोड़ना लेने से थोड़ा लम्बा हो।

  7. 6–9 आवृत्तियों से शुरू करें; अंत में बाएँ से साँस छोड़कर क्षण भर शांत बैठें।

अभी अभ्यास करें

वृत्त के साथ साँस लें

साँस लेते समय वृत्त बढ़ेगा और छोड़ते समय सिमटेगा। बस उसके साथ चलिए।

आवृत्ति 1 / 8

एक मिनट या अधिक के सत्र आपकी साधना में जुड़ते हैं — केवल इसी डिवाइस पर। शरीर कहे तो कभी भी रुक जाइए।

कब और कितना

खाली पेट, सुबह या शाम सर्वोत्तम। आरम्भ में साँस रोकना नहीं; कुम्भक केवल गुरु के मार्गदर्शन में जोड़ा जाता है।

किसलिए किया जाता है

ध्यान और जप की उत्तम तैयारी; साधक इसे क्रोध शांत करने, बिखरे ध्यान को समेटने और सहज नींद के लिए करते हैं।

साथ जँचने वाली साधनाएँ