पंचांग
आज का पंचांग
हिंदू दिन के पाँच अंग, सूर्योदय-सूर्यास्त और दिन के समय, आपके चुने शहर के लिए गणना किए हुए।
पाँच अंग
- तिथि
- पक्ष
- नक्षत्र
- योग
- करण
- वार
मास और वर्ष
- चांद्र मास
- संवत्सर
आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?
शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।
सूर्य और चंद्र
- सूर्योदय
- सूर्यास्त
- चंद्रोदय
- चंद्रास्त
दिन के समय
- राहु काल
- यमगंड
- गुलिक काल
- अभिजित मुहूर्त
अंग स्थानीय सूर्योदय के समय के दिए गए हैं, जो परंपरा का संदर्भ-बिंदु है। हर अंग के साथ लिखा समय उसकी समाप्ति का है।
हमारे सर्वर पर सूर्य और चंद्र की स्थितियों से गणना (VSOP87 और Meeus श्रेणियाँ, लाहिड़ी अयनांश), वही विधि जो छपे पंचांगों के पीछे है। समय निकटतम मिनट तक गोल किए गए हैं और छपे पंचांग से एक-दो मिनट अलग हो सकते हैं; हमारी जाँच में तिथि और नक्षत्र की सीमाएँ दृक पंचांग से लगभग एक मिनट के भीतर मिलीं। चंद्रोदय और चंद्रास्त नागरिक दिन (मध्यरात्रि से मध्यरात्रि) के हैं। 1950 से 2099 तक की तिथियाँ।
चुना हुआ शहर केवल इसी उपकरण पर सहेजा जाता है।
इन शब्दों का अर्थ
- तिथि: एक चांद्र दिन, चंद्र-चक्र का तीसवाँ भाग; अमावस्या से शुक्ल पक्ष में और पूर्णिमा से कृष्ण पक्ष में गिना जाता है। त्योहार तिथि से चलते हैं, इसीलिए उनकी तारीखें अंग्रेज़ी कैलेंडर पर हर साल बदलती हैं।
- नक्षत्र: आकाश के 27 भागों में चंद्र का स्थान। यह लगभग रोज़ बदलता है।
- योग: सूर्य और चंद्र की स्थितियों के 27 संयोगों में से एक, जिसे मुहूर्त चुनने में देखा जाता है।
- करण: आधी तिथि। ग्यारह नाम महीने में बारी-बारी आते हैं।
- राहु काल: दिन के प्रकाश का लगभग आठवाँ भाग, क़रीब नब्बे मिनट, जिसमें परंपरा नया काम शुरू करने से बचती है; यह दिन में कब पड़ेगा, वार पर निर्भर है। यमगंड और गुलिक काल ऐसे ही दो और समय हैं। दोपहर के आस-पास का अभिजित शुभ माना जाता है।
- चांद्र मास: शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का (पूर्णिमांत) और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का (अमांत) होता है। दोनों नाम सही हैं; ऊपर का चुनाव केवल यह तय करता है कि कौन-सा दिखे।
- संवत्सर: साठ वर्षों के चक्र में वर्ष का नाम, यहाँ दक्षिणी (शालिवाहन शक) परंपरा से, शक वर्ष के साथ।