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Dharamkira

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शीतकारी

शीतकारी प्राणायाम

शीतकारी = 'सीत्' ध्वनि करने वाली

जिनकी जीभ नहीं मुड़ती उनके लिए शीतली की बहन — दाँतों पर से 'सीत्' के साथ ठंडी हवा पीजिए।

श्वास — प्राणायामकोमल — सबके लिए

सबसे सरल शब्दों में

दाँत मिलाकर मुस्कुराओ, फिर दाँतों से हवा भीतर खींचो — 'सीत्' — जैसे कुछ ठंडा चख रहे हो। मुँह बंद कर नाक से साँस छोड़ो। झटपट भीतरी ठंडक — जीभ मोड़ने की ज़रूरत ही नहीं!

यह क्या है

लगभग एक-तिहाई लोग जीभ को शीतली की नली नहीं बना पाते, और उनके लिए हठयोग प्रदीपिका की शीतकारी (II.54) काम आती है: दाँत कोमलता से मिले, होंठ हल्की मुस्कान में खुले, और दाँतों पर से 'सीत्' की धीमी ध्वनि के साथ खिंचती साँस, जो जीभ के तल पर ठंडी उतरती है। प्रश्वास नाक से उष्ण होकर निकलता है। वही शीतल औषधि, चम्मच दूसरा — और ग्रन्थ यह मोहक वचन भी जोड़ते हैं कि इसका अभ्यासी संतुष्ट और स्वस्थचित्त होता है, जिसे तपती दोपहरों के नियमित साधक सहज ही मान लेते हैं।

स्रोत: शास्त्रीय हठयोग — हठयोग प्रदीपिका II.54–56, शीतली की सहचरी।

अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि

ठंडे मौसम, ज़ुकाम व दमे के दौर, और अति-संवेदनशील दाँतों में न करें (ठंडी धार सीधे उन्हीं पर पड़ती है)। मुँह की हवा छनी नहीं होती — स्वच्छ वायु में करें। निम्न रक्तचाप में आवृत्तियाँ थोड़ी रखें।

अभ्यास कैसे करें

  1. छाया में सहज बैठें; ऊपर-नीचे के दाँत कोमलता से मिलाएँ।

  2. होंठ हल्की मुस्कान में खोलें ताकि दाँत दिखें।

  3. दाँतों पर से 'सीत्' की कोमल ध्वनि संग धीरे-धीरे साँस खींचें — जीभ पर ठंडक महसूस करें।

  4. होंठ बंद कर नाक से धीरे-धीरे साँस छोड़ें।

  5. बिना जल्दी 6–10 आवृत्तियाँ करें।

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वृत्त के साथ साँस लें

साँस लेते समय वृत्त बढ़ेगा और छोड़ते समय सिमटेगा। बस उसके साथ चलिए।

आवृत्ति 1 / 8

एक मिनट या अधिक के सत्र आपकी साधना में जुड़ते हैं — केवल इसी डिवाइस पर। शरीर कहे तो कभी भी रुक जाइए।

कब और कितना

गरम घड़ियाँ, तपा मन, धूप और भीड़ के बाद — जहाँ भी शीतली काम आती, वहीं यह — उन मुखों के लिए जिन्हें यही द्वार भाता है।

किसलिए किया जाता है

देह और स्वभाव की शीतलता; आधुनिक गुरु इसे स्वस्थ दाँत-मसूड़ों से भी जोड़ते हैं, और हठयोग प्रदीपिका संतुष्ट, स्थिर मन से (II.55–56)।

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