त्रिलोक की परिक्रमा
कथा 1 / 5एक दिन देवर्षि नारद एक स्वर्ण आम लेकर आए — अमर ज्ञान का फल, अविभाज्य, केवल एक संतान के लिए। शिव-पार्वती ने दोनों पुत्रों की स्पर्धा रखी: जो तीनों लोकों की तीन परिक्रमा पहले करे, फल उसका। कार्तिकेय अपने मयूर पर पलक झपकते ओझल हो गए। गणेश ने अपने मूषक को देखा, अपने उदर को देखा, और सोचा। फिर उठे, बैठे हुए माता-पिता की तीन धीमी परिक्रमाएँ कीं और हाथ जोड़कर कहा: 'मेरा संसार तो आप ही हैं।' कार्तिकेय दूसरा समुद्र भी न लाँघ पाए थे कि आम गणेश का हो चुका था। सीख जो परम्परा कभी दोहराते नहीं थकती: दौड़ वही जीतता है जो समझ ले कि संसार वस्तुतः है क्या — और जिन्होंने जीवन दिया, वही उसे समेटे हैं।
स्रोत: पुराण-परम्परा, अखिल भारत में प्रचलित



