
गणेश
गणेश चतुर्थी
गणपति दस दिन के लिए घर आते हैं — स्थापना से विसर्जन तक।
तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
सबसे सरल शब्दों में
गणेश जी घर आते हैं! दस दिनों तक मिट्टी के गणपति हमारे मेहमान — मोदक, आरती और बाजे — फिर जल में विसर्जन के साथ कहते हैं, 'अगले बरस तू जल्दी आ'।
कथा और उद्देश्य
पार्वती ने चंदन से द्वार-रक्षक बालक गढ़ा; प्रवेश से रोके गए शिव ने उसका शीश काटा — और गज-मस्तक देकर उसे पुनर्जीवित कर प्रथम-पूज्य बनाया। उनकी जन्म-तिथि उन्हें वर्ष के सबसे प्रिय अतिथि रूप में घर ले आती है।
1893 में तिलक ने महाराष्ट्र में इसे सार्वजनिक रूप दिया — घरेलू पूजा से दस दिनों का सामुदायिक उत्सव और संगीत।
दस दिन बाद विसर्जन मिट्टी को जल में लौटा देता है — आगमन, सम्मानित वास, विदा: भक्ति का पूरा चक्र, हर वर्ष दोहराया हुआ।
क्या किया जाता है
स्थापना-प्राणप्रतिष्ठा
शुभ मुहूर्त में मूर्ति-स्थापना और प्राणप्रतिष्ठा।
नित्य पूजा-मोदक
प्रातः-सायं आरती; 21 मोदक और दूर्वा — उनके प्रियतम अर्पण।
विसर्जन
डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन पर विदाई — गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस जल्दी आना।
श्रेष्ठ समय
स्थापना-पूजन मध्याह्न में — उनका जन्म-काल।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
इस रात चंद्र-दर्शन वर्जित है — चंद्रमा ने कभी गणेश का उपहास किया था।
मुंबई के लालबागचा राजा के दर्शन में प्रतिदिन लाखों की पंक्तियाँ।
कच्ची मिट्टी और वनस्पति-रंगों की इको-मूर्तियाँ विसर्जन को उसका अर्थ लौटा रही हैं — बिना अवशेष घुल जाना ही विधि का भाव है।