गणेश
वक्रतुण्ड महाकाय
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सरल उच्चारण
Vak-ra-tun-da ma-haa-kaa-ya soor-ya-ko-ti sa-ma-pra-bha, nir-vigh-nam ku-ru me de-va sar-va kaar-ye-shu sar-va-daa
Vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi-samaprabha, nirvighnaṁ kuru me deva sarva-kāryeṣu sarvadā
इस मंत्र के विषय में
गणेश जी का सर्वाधिक प्रिय ध्यान-श्लोक — तीन विशेषण और एक प्रार्थना; किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य के आरंभ से पहले इसका पाठ होता है।
अर्थ
हे वक्रतुण्ड, विशाल काया वाले, करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी देव — मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न कीजिए। श्लोक 'निर्विघ्न' माँगता है: यह नहीं कि कार्य हमारे लिए कर दिया जाए, बल्कि यह कि पथ इतना निष्कंटक हो कि हमारा अपना पुरुषार्थ फल सके। 'सर्वदा, सर्वकार्येषु' इसे वह एक प्रार्थना बना देता है जो जीवन के हर प्रयास को ढँक लेती है।
मंत्र कंठस्थ करें
पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।
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वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।
Vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi-samaprabha, nirvighnaṁ kuru me deva sarva-kāryeṣu sarvadā
0अभी नहीं बोला
अगली पंक्ति से पहले ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जब पंक्ति बिना पढ़े आ जाए, तब आगे बढ़ें।
प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।
कब जपें
उन कार्यों से पहले जिनके सामने सचमुच विघ्न खड़े हों — कठिन यात्रा, परीक्षा, न्यायालय की तारीख़, शल्य-चिकित्सा की सुबह — और पूजा के आरंभ में। संकष्टी और विनायक चतुर्थी व्रतों का सहज साथी।
शब्द-दर-शब्द
- वक्रतुण्डvakratuṇḍa
- टेढ़ी सूँड वाले
- महाकायmahākāya
- विशाल शरीर वाले
- सूर्यकोटिसमप्रभsūryakoṭi-samaprabha
- करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी
- निर्विघ्नं कुरुnirvighnaṁ kuru
- निर्विघ्न कीजिए
- मेme
- मेरे
- सर्वकार्येषुsarva-kāryeṣu
- सभी कार्यों में
- सर्वदाsarvadā
- सदा
स्रोत: पारंपरिक गणेश ध्यान-श्लोक, अधिकांश गणेश-पूजाओं के आरंभ में पढ़ा जाता है; कोई एक शास्त्रीय स्रोत स्थापित नहीं है।

