गणेश
गणेश गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
Oṁ ekadantāya vidmahe vakratuṇḍāya dhīmahi, tanno dantī pracodayāt
सरल उच्चारण: Om e-ka-dan-taa-ya vid-ma-he, vak-ra-tun-daa-ya dhee-ma-hi, tan-no dan-tee pra-cho-da-yaat
इस मंत्र के विषय में
गणेश जी की गायत्री — प्राचीन गायत्री छन्द एकदन्त प्रभु की ओर, बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना के साथ।
अर्थ
हम एकदन्त को जानें; वक्रतुण्ड का ध्यान करें; वे दन्ती हमारी बुद्धि को प्रदीप्त करें। हर गायत्री की तरह यह तीन चरणों में चलती है — जानना, ध्यान करना, प्रेरित होना — पूरी साधना-पद्धति एक ही छन्द में। और 'एकदन्त' अपने भीतर एक शिक्षा रखता है: सबसे प्रसिद्ध कथा में वह टूटा दाँत वह लेखनी है जिससे महाभारत लिखा गया — प्रज्ञा के लिए अर्पित पूर्णता।
कब जपें
त्वरित प्रणाम नहीं, सतत साधना के लिए — प्रातः साधना, अध्ययन-काल और चतुर्थी व्रतों में; परंपरा से ब्राह्म मुहूर्त में, जब मन अभी किसी का नहीं हुआ होता।
शब्द-दर-शब्द
- एकदन्ताय विद्महेekadantāya vidmahe
- हम एकदन्त को जानते हैं
- वक्रतुण्डाय धीमहिvakratuṇḍāya dhīmahi
- वक्रतुण्ड का ध्यान करते हैं
- तन्नो दन्ती प्रचोदयात्tanno dantī pracodayāt
- वे दन्ती हमें प्रेरित करें
स्रोत: गणपति अथर्वशीर्ष
टिप्पणी: महानारायण उपनिषद (तैत्तिरीय आरण्यक १०) में इसका प्राचीन रूप मिलता है: 'तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्'। यहाँ गणपति अथर्वशीर्ष का 'एकदन्ताय' और 'दन्ती' वाला रूप लिया गया है।

