
गणेश
संकष्टी चतुर्थी
मासिक चंद्रोदय-व्रत — संकट गणपति को सौंपे जाते हैं, पारण चंद्र-दर्शन से।
सभी तिथियाँ (+8)
तिथि: प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्थी
सबसे सरल शब्दों में
हर माह गणेश जी से चाँदनी भेंट — दिन भर व्रत, फिर चन्द्र-दर्शन और मोदक अर्पण के बाद ही पारण।
कथा और उद्देश्य
संकष्टी — 'संकट से पार' — गणेश की भक्तों से मासिक भेंट है: दिन-भर व्रत, गोधूलि में पूजन, और पारण तभी जब चंद्र उदित होकर अर्घ्य पा लें। व्रत की बनावट में ही उसका अर्थ है: संकटों का, व्रत की तरह, नियत अंत होता है — और वह चंद्रोदय-सा अवश्य आता है।
तिथि मंगलवार को पड़े तो 'अंगारकी संकष्टी' — सर्वाधिक फलदायी मानी जाती है; उस दिन सिद्धिविनायक की पंक्तियाँ किलोमीटरों लंबी होती हैं। माघ की संकष्टी 'सकट चौथ' है — माताएँ तिल-गुड़ अर्पण संग संतान के लिए रखती हैं।
क्या किया जाता है
दिवस-व्रत
यथाशक्ति व्रत — फलाहार या निराहार — प्रातः गणपति-संकल्प सहित।
संध्या पूजा
गोधूलि में दूर्वा, मोदक, रक्तपुष्प; मास की संकष्टी-कथा।
चंद्र अर्घ्य
उदित चंद्र को जल-अक्षत — तत्पश्चात पारण।
गणेश जाप
चंद्रोदय की प्रतीक्षा में ॐ गं गणपतये नमः — 108 बार।
श्रेष्ठ समय
पूजा गोधूलि में; पारण स्थानीय चंद्रोदय के बाद ही — जो नगर व मास से बदलता है।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
संकष्टी का चंद्रोदय देर से होता है — प्रायः रात 8:30–10 बजे — व्रत स्वयं धैर्य सिखाता है।
शुक्लपक्ष की समकक्ष विनायक चतुर्थी मध्याह्न तक रखी जाती है।
अधिक मास वाले वर्ष में तेरह संकष्टी होती हैं — अधिक मास की संकष्टी 'विभुवन संकष्टी' कहलाती है।