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Dharamkira
त्योहार पंचांग
व्याघ्रचर्म पर ध्यानमग्न बैठे शिव, सिर पर नाग-फन, पास में पार्वती और पीछे काशी के घाट — लगभग 1895 का रंगीन लिथोग्राफ।
ध्यानमग्न शिवलोकप्रिय रंगीन लिथोग्राफ, कलकत्ता (ब्रिटिश म्यूज़ियम एल्बम), c. 1895

अनंत ज्योति रूप शिव; कृत्तिकाओं के मुरुगन

कार्तिगै दीपम्

दीपों का तमिल महापर्व — और अरुणाचल शिखर की एक महाज्योति, सबका उत्तर देती।

तमिलनाडु — तिरुवण्णामलै में सबसे भव्य
महादीपम् 2026: मंगलवार, 24 नवंबर 2026महादीपम् 2027: शनिवार, 11 दिसंबर 2027

तिथि: तमिल कार्तिगै मास का कृत्तिका नक्षत्र, पूर्णिमा के संग।

सबसे सरल शब्दों में

तमिलनाडु का प्राचीनतम दीप-पर्व — अरुणाचल पर्वत पर विशाल ज्योति शिव का प्रकाश-स्तम्भ रूप बनती है, और हर द्वार के नन्हे दीये उसकी प्रतिध्वनि।

कथा और उद्देश्य

जब ब्रह्मा-विष्णु में श्रेष्ठता-विवाद हुआ, शिव उनके मध्य आदि-अंतहीन अग्नि-स्तंभ बनकर उठे — लिंगोद्भव। अरुणाचल पर्वत वही शीतल हुई ज्योति माना जाता है; और कार्तिगै दीपम् की संध्या उसके शिखर पर घृत-कर्पूर का महाकुंड जलता है — महादीपम्, पैंतीस किलोमीटर तक दृश्य, और घोष उठता है 'अण्णामलैयारुक्कु अरोहरा!'

यह तमिल साहित्य के प्राचीनतम पर्वों में है — संगम काव्य में कार्तिगै की दीप-पंक्तियाँ गाई गई हैं। घर अगल विळक्कु (मिट्टी के दीपों) से स्वयं को घेर लेते हैं; शिशु मुरुगन को पालने वाली छह कृत्तिका ताराओं से यह उनका भी दिन है।

क्या किया जाता है

दीप-पंक्तियाँ

गोधूलि के बाद हर देहरी, झरोखे और कोलम-बिंदु पर तेल-दीप।

भरणी और महादीपम्

तिरुवण्णामलै में भोर का भरणी दीपम् और संध्या की शिखर-ज्योति; रात्रि-भर गिरिवलम् (14 किमी परिक्रमा)।

दीप जाप

दीपों के सम्मुख ॐ नमः शिवाय; लौ का दर्शन — निराकार का साकार।

श्रेष्ठ समय

गृह-दीप प्रदोष में; महादीपम् पर्वत पर सूर्यास्त के क्षण।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • रमण महर्षि ने अरुणाचल को अपने जीवन और शिक्षा का स्थिर केंद्र बनाया — उनके लिए यह पर्वत स्वयं शिव था, शिला बनी ज्योति।

  • शिखर-ज्योति सहस्रों लीटर घृत पीती है — वंश-परंपरागत परिवार उसे ऊपर पहुँचाते हैं।

  • तमिल घरों में कार्तिगै दीपावली के दीपों को महीने-भर बढ़ा देता है — प्रकाश को रात नहीं, ऋतु मिलती है।

इस पर्व के मंत्र