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Dharamkira
मंत्र संग्रह

सार्वभौम

दीपज्योतिः परब्रह्म

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः । दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥

Dīpa-jyotiḥ parabrahma dīpa-jyotir janārdanaḥ, dīpo haratu me pāpaṁ dīpa-jyotir namo'stu te

सरल उच्चारण: Dee-pa jyo-tih pa-ra-brah-ma, dee-pa jyo-tir ja-naar-da-nah, dee-po ha-ra-tu me paa-pam, dee-pa jyo-tir na-mo-stu te

शांतिभक्ति

इस मंत्र के विषय में

दीप-वन्दना का सहवर्ती श्लोक, संध्या-दीप पर 'शुभं करोति' के साथ कहा जाता है। वह श्लोक गिनाता है कि लौ क्या देती है; यह कहता है कि लौ क्या है।

अर्थ

दीप की ज्योति परब्रह्म है; दीप की ज्योति जनार्दन हैं। दीप मेरे पाप हर ले — हे दीपज्योति, तुम्हें नमस्कार। श्लोक एक समीकरण का साहस करता है — यह नन्ही लौ परब्रह्म है — क्योंकि अग्नि घर की अकेली वस्तु है, जो परम की तरह व्यवहार करती है: साँझ-भर स्वयं को बाँटती हुई भी अक्षय। जो पाप वह हरती है, वैसे ही हरती है जैसे प्रकाश अंधकार को — बल से नहीं, उपस्थिति से।

कब जपें

संध्या-दीप पर; किसी भी पर्व पर दीये जलाते हुए, और कार्तिक की दीपमय संध्याओं व देव दीपावली में पढ़ा जाता है।

शब्द-दर-शब्द

दीपज्योतिः परब्रह्मdīpa-jyotiḥ parabrahma
दीपज्योति परब्रह्म है
जनार्दनःjanārdanaḥ
जनार्दन (विष्णु)
दीपो हरतु मे पापंdīpo haratu me pāpaṁ
दीप मेरे पाप हर ले
नमोऽस्तु तेnamo'stu te
तुम्हें नमस्कार

स्रोत: पारंपरिक दीप-वन्दना श्लोक

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः । दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥

Dīpa-jyotiḥ parabrahma dīpa-jyotir janārdanaḥ, dīpo haratu me pāpaṁ dīpa-jyotir namo'stu te

लक्ष्य
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