शिव
शिवोऽहम् — निर्वाण षटकम् की टेक
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
Cidānanda-rūpaḥ śivo'haṁ śivo'ham
सरल उच्चारण: Chi-daa-nan-da roo-pah shi-vo-ham shi-vo-ham
इस मंत्र के विषय में
निर्वाण षटकम् की टेक — आदि शंकराचार्य को समर्पित छह श्लोक। हर श्लोक इसी पंक्ति पर समाप्त होता है, इसलिए यह काव्य में छह बार आती है — और अकेले जाप रूप में भी।
अर्थ
मैं चित् और आनन्द स्वरूप हूँ — मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ। यह किसी अन्य की स्तुति नहीं, स्वयं की पहचान है: निर्वाण षटकम् जब हर उपाधि नकार चुकता है — न मन, न देह, न जाति, न भय — तब यही टेक खड़ी रह जाती है। इसे दोहराते हुए साधक घटाव का अभ्यास करता है, जब तक नाम पर दावा करने के लिए केवल चेतना और आनन्द शेष न रहें।
कब जपें
साधना के बाद की नीरवता के लिए — ध्यान के समापन पर, एकांत-साधना के दिनों में, और जब भी 'मैं कौन हूँ' डगमगाए; शिवरात्रि के उत्तर-प्रहर परंपरा से इसे धारण करते हैं।
शब्द-दर-शब्द
- चित्cit
- शुद्ध चेतना
- आनन्दānanda
- आनन्द
- रूपःrūpaḥ
- जिसका स्वरूप है
- शिवोऽहम्śivo'ham
- मैं शिव हूँ
स्रोत: निर्वाण षटकम् (आदि शंकराचार्य)

