
सीता (जानकी)
सीता नवमी
धरती की अपनी बेटी का प्राकट्य-दिवस — हल-रेखा की जानकी।
तिथि: वैशाख शुक्ल नवमी
सबसे सरल शब्दों में
सीता माता का प्राकट्य दिवस — धरती की रेखा (हल-रेखा) में मिली नन्ही कन्या, जो पूरी रामायण के हृदय की शांत शक्ति बनीं।
कथा और उद्देश्य
मिथिला में यज्ञ-भूमि जोतते राजा जनक को हल-रेखा — 'सीता' — से एक तेजोमयी कन्या मिली, और निःसंतान राजा ने जाना कि धरती ने उन्हें पुत्री दी है। राम नवमी के ठीक एक चंद्र-मास बाद परंपरा उनकी अर्धांगिनी का प्राकट्य मनाती है।
सीता भूमिजा हैं — पृथ्वी से जन्मी — और उनकी पूरी कथा में धरती की गरिमा है: वह धैर्य जो दुर्बलता नहीं, वनवास में अडिगता, और अंत में अपनी शर्तों पर धरती-माँ में वापसी। सुहागिनें यह व्रत गृह-कल्याण के लिए रखती हैं — सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं।
क्या किया जाता है
सीता-राम पूजन
श्रीराम के संग जानकी का पूजन — पीत पुष्प, अक्षत, खीर।
व्रत और कथा
दिवस-व्रत और रामायण से प्राकट्य-कथा का पाठ।
भूमि-वंदना
समुद्रवसने देवि — धरती से क्षमा माँगने वाला प्रातः श्लोक — आज अपने पूर्ण अर्थ में।
राम जाप
श्रीराम जय राम अथवा राम गायत्री — 108 बार।
श्रेष्ठ समय
पूजा मध्याह्न में — हल-रेखा से प्राकट्य की बेला।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
बिहार का सीतामढ़ी और नेपाल का जनकपुर — दोनों उनकी जन्मस्थली होने का गौरव रखते हैं; आज दोनों में मेले जुटते हैं।
वाल्मीकि उन्हें वैदेही, मैथिली, जानकी कहते हैं — भूमि, राज्य और ऋषि-राजा की पुत्री।
सीता — 'हल-रेखा' — ऋग्वेद के कृषि-सूक्त में पहले से देवी हैं: 'अर्वाची सुभगे भव सीते' (4.57.6)।
इस पर्व के मंत्र
श्री राम जय राम जय जय राम
श्री राम जय राम — त्रयोदशाक्षरी जाप
जाप आरंभ करें →ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥
राम गायत्री
जाप आरंभ करें →समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥
समुद्रवसने — पृथ्वी वन्दना
जाप आरंभ करें →रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
रामाय रामभद्राय
जाप आरंभ करें →टिप्पणी: कुछ पंचांग मध्याह्न-व्यापिनी तिथि से 15 मई 2027 मानते हैं। अपने कुल का पंचांग मानें।