सार्वभौम
समुद्रवसने — पृथ्वी वन्दना
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥
Samudra-vasane devi parvata-stana-maṇḍale, viṣṇu-patni namas tubhyaṁ pāda-sparśaṁ kṣamasva me
सरल उच्चारण: Sa-mud-ra va-sa-ne de-vi, par-va-ta sta-na man-da-le, vish-nu pat-ni na-mas tubh-yam, paa-da spar-sham ksha-mas-va me
इस मंत्र के विषय में
प्रातः धरती पर पहला पैर रखने से पहले कहा जाता है — सागर-वस्त्रा धरती माता से चरण-स्पर्श के लिए क्षमा-याचना।
अर्थ
हे सागरों को वस्त्र रूप में धारण करने वाली, पर्वतों को धारण करने वाली देवी, विष्णुपत्नी — तुम्हें नमस्कार; मेरे चरण-स्पर्श को क्षमा करो। यह एक ही भाव में परंपरा का पर्यावरण-दर्शन है: पृथ्वी को व्यक्ति मानकर सम्बोधन — वस्त्र धारण किए, जीवित — जिसकी देह पर पाँव रखे बिना निर्वाह नहीं। क्षमा-याचना अपराध-बोध नहीं, शिष्टाचार है: दिन इस स्वीकृति से खुलता है कि हम किसके आतिथ्य में हैं।
कब जपें
कर-दर्शन के तुरंत बाद, जब पाँव पहली बार भूमि छूते हैं — प्रातः की दूसरी आदत; और भूमि पर हल, खुदाई या निर्माण से पहले भी।
शब्द-दर-शब्द
- समुद्रवसने देविsamudra-vasane devi
- हे सागर-वस्त्रा देवी
- पर्वतस्तनमण्डलेparvata-stana-maṇḍale
- पर्वतों को धारण करने वाली
- विष्णुपत्निviṣṇu-patni
- विष्णुपत्नी
- पादस्पर्शं क्षमस्व मेpāda-sparśaṁ kṣamasva me
- मेरे चरण-स्पर्श को क्षमा करें
स्रोत: पारंपरिक प्रातः-स्मरण श्लोक

