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Dharamkira
त्योहार पंचांग
व्याघ्रचर्म पर ध्यानमग्न बैठे शिव, सिर पर नाग-फन, पास में पार्वती और पीछे काशी के घाट — लगभग 1895 का रंगीन लिथोग्राफ।
ध्यानमग्न शिवलोकप्रिय रंगीन लिथोग्राफ, कलकत्ता (ब्रिटिश म्यूज़ियम एल्बम), c. 1895

भगवान शिव

सावन शिवरात्रि

शिव के अपने मास की शिवरात्रि — जिस रात काँवर का जल घर पहुँचता है।

शनिवार, 31 जुलाई 2027

तिथि: श्रावण कृष्ण चतुर्दशी (पूर्णिमांत) (उत्तर) · आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी (पश्चिम-दक्षिण)रात वही है

आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?

शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।

सबसे सरल शब्दों में

श्रावण मास की शिवरात्रि — शिव का प्रिय मौसम — जब काँवरिये नंगे पाँव गंगाजल लाकर उनका अभिषेक करते हैं।

कथा और उद्देश्य

हर मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि है, पर सावन की शिवरात्रि महाशिवरात्रि के ही समकक्ष खड़ी है — क्योंकि पूरा मास पहले से शिव का है। यही काँवर यात्रा का गंतव्य है: दिनों से गंगाजल उठाए नंगे पाँव यात्री आज रात अपने क्षेत्र के शिवलिंग पर वह जल चढ़ाते हैं।

समुद्र मंथन की कथा इस मास पर छाया करती है: बहुतों की मान्यता में श्रावण में ही शिव ने हलाहल पिया था — इसलिए महीने-भर उन पर चढ़ता जल संसार का शीतल धन्यवाद है।

क्या किया जाता है

जलाभिषेक

गंगाजल या स्वच्छ जल से बेलपत्र सहित लिंगाभिषेक — कितना भी सरल हो, यही सार है।

व्रत और निशिता पूजा

दिवस-व्रत, महाशिवरात्रि की भाँति निशिता काल में रात्रि-पूजन।

पंचाक्षरी जाप

ॐ नमः शिवाय — 108 या रात्रि-व्यापी माला।

श्रेष्ठ समय

अभिषेक प्रातः से; पूर्ण विधि हेतु रात्रि के चार प्रहर।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • सावन में हरिद्वार, गौमुख, सुल्तानगंज की काँवर-राहें करोड़ों तक पहुँचती हैं।

  • काशी विश्वनाथ, बैद्यनाथ, नीलकंठ इस रात के आसपास वर्ष का सघनतम मास देखते हैं।

  • विंध्य के दक्षिण (अमांत गणना) में यह रात आषाढ़ में गिनी जाती है — मास-नाम भिन्न, रात्रि एक।

इस पर्व के मंत्र