शिव
रुद्र गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
Oṁ tatpuruṣāya vidmahe mahādevāya dhīmahi, tanno rudraḥ pracodayāt
सरल उच्चारण: Om tat-pu-ru-shaa-ya vid-ma-he, ma-haa-de-vaa-ya dhee-ma-hi, tan-no rud-rah pra-cho-da-yaat
इस मंत्र के विषय में
महानारायण उपनिषद से महादेव शिव की गायत्री — वहाँ की गायत्रियों के समूह में से एक, जिनमें प्राचीन छन्द हर बार किसी भिन्न देवता की ओर मुड़ता है।
अर्थ
हम उस परम पुरुष को जानें; महादेव का ध्यान करें; रुद्र हमारी बुद्धि को गति दें। गायत्री का साँचा नाम को साधना बना देता है — पहले परिचय, फिर तल्लीनता, फिर प्रार्थना कि वह तल्लीनता निष्क्रिय न रहे। और प्रेरित करने का कार्य रुद्र — झंझा-रूप — से माँगा गया है: जो हमें महादेव की ओर ले जाए, वह प्रचंड भी हो सकता है; प्रार्थना इसे स्वीकार करती है।
कब जपें
गहरी शिव-साधना के लिए — सोमवार, प्रदोष की संध्याएँ, सावन और अभिषेक; इसे वे साधक रखते हैं जो क्षणिक प्रणाम नहीं, दीर्घ दैनिक अनुशासन गढ़ रहे हों।
शब्द-दर-शब्द
- तत्पुरुषाय विद्महेtatpuruṣāya vidmahe
- हम उस परम पुरुष को जानते हैं
- महादेवाय धीमहिmahādevāya dhīmahi
- महादेव का ध्यान करते हैं
- तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्tanno rudraḥ pracodayāt
- रुद्र हमें प्रेरित करें
स्रोत: तैत्तिरीय आरण्यक १० (महानारायण उपनिषद)

