
सूर्य देव
मकर संक्रांति
सूर्य उत्तरायण होते हैं — फसल, कृतज्ञता और नया प्रकाश।
तिथि: सूर्य का मकर राशि में प्रवेश — गिने-चुने स्थिर-तिथि पर्वों में से एक।
सबसे सरल शब्दों में
सूरज उत्तर की ओर मुड़ता है और दिन बड़े होने लगते हैं — इसलिए सब पतंग उड़ाते हैं, तिल-गुड़ खाते हैं और सूरज को धन्यवाद कहते हैं।
कथा और उद्देश्य
संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का पर्व है — वर्ष का वह उत्तरगामी भाग जिसे परंपरा देवताओं का दिन मानती है। शर-शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने देह त्यागने के लिए इसी घड़ी की प्रतीक्षा की थी।
पूरे भारत में यह फसल की कृतज्ञता का महापर्व है — दक्षिण में पोंगल, उत्तर में लोहड़ी की अग्नि, गुजरात में उत्तरायण की पतंगें — एक ही सूर्य, अनेक भाषाओं में पूजित।
तिल और गुड़ इसकी भाषा हैं: 'तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला' — तिल-गुड़ लो, और इस वर्ष मीठा बोलो।
क्या किया जाता है
स्नान और सूर्य अर्घ्य
स्नान (संभव हो तो पवित्र नदी में) और उगते सूर्य को जल अर्पण।
तिल-गुड़
तिल और गुड़ — खाया, बाँटा और अर्पित किया जाता है; शीत ऋतु में उष्णता और मिठास।
दान
खिचड़ी, तिल, कंबल का दान — संक्रांति का दान विशेष पुण्यकारी माना गया है।
सूर्य जाप
सूर्योदय पर सूर्य के बारह नाम या गायत्री का जाप।
श्रेष्ठ समय
पुण्यकाल संक्रमण के बाद के दिन के प्रहरों में रहता है; प्रातः स्नान-दान श्रेष्ठ।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इस दिन को बस 'खिचड़ी' कहते हैं — वही भोजन जो पकाया, खाया और दिया जाता है।
कुंभ मेले के प्रमुख स्नान संक्रांति संक्रमणों से ही निश्चित होते हैं।
तमिलनाडु में यही पर्व पोंगल है — नई फसल का चावल उफनने तक पकाया जाता है।