
सूर्य देव · 5–10 मिनट
सूर्य अर्घ्य — सूर्य को जल
प्रतिदिन प्रातः; रविवार, संक्रांति, छठ, रथ सप्तमी
सबसे सरल शब्दों में
सबसे सरल प्रातः प्रार्थना: उगते सूर्य की ओर मुख, लोटे से धीरे-धीरे जल, और संसार के प्रकाश को सुप्रभात।
सबसे प्राचीन नित्य-विधान: उदित सूर्य को उठाया गया जल, पतली धार में अर्पित, श्वास में उनका नाम। चाहिए बस ताम्र-पात्र और आकाश — और दिन के पहले क्षण प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं।
यह विधि मंदिरों से भी पुरानी है: वैदिक संध्या में इसी सूर्य का स्वागत जल और ऋचा से होता था। रीढ़ सीधी रहे, और मन क्षण भर उस धारा-सा निर्मल जो आप अर्पित करते हैं।
सामग्री
0/3 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/6 पूर्णस्नान/शुद्धि; लोटा भरें
स्नान (या कम-से-कम हाथ-मुख शुद्धि) के बाद ताम्र-पात्र भरें; इच्छा हो तो अक्षत-पुष्पदल डालें।
उदित सूर्य के सम्मुख
पूर्वाभिमुख खड़े हों। सूर्य को सीधे न देखें — दृष्टि गिरती जलधारा पर रहे; परंपरा से उसी में से सूर्य-तेज कोमल होकर आँखों तक आता है।
अर्घ्य अर्पण
लोटा हृदय की ऊँचाई या ऊपर उठाकर धीमी, अखंड धारा में अर्पण करें, धारा के साथ मंत्र दोहराते हुए; समय हो तो तीन बार अर्पण।
ॐ सूर्याय नमः
Oṁ Sūryāya Namaḥ
ॐ, सूर्य को प्रणाम — प्रेरक, अंधकार के निवारक। यह नाम सूर्य को प्रकाश ही नहीं, गति भी बना देता है: जो सबको चला रहा है। साधक उस शक्ति को नमन करता है जिसने यह भोर पहले ही चला दी है — और प्रार्थना करता है कि जड़ता नहीं, वही उसे चलाए।
स्रोत: सूर्य नमस्कार मंत्र-क्रम (सूर्य के पारंपरिक बारह नाम)
बारह नाम (रविवार/विशेष दिवस)
रविवार व सूर्य-पर्वों पर बारह नाम जोड़ें — मित्र, रवि, सूर्य, भानु… — प्रत्येक के लिए एक अर्घ्य-भाव, या पुस्तकालय के सूर्य-खंड से प्रत्येक नाम का लघु जाप।
ॐ मित्राय नमः
Oṁ Mitrāya Namaḥ
ॐ, मित्र को प्रणाम — सबके सखा। पहली किरण का वंदन स्वयं मैत्री के रूप में होता है: सूर्य बिना बुलाए हर प्राणी पर चमकता है और बदले में कुछ नहीं माँगता। मित्र को नमन कर साधक दिन का आरंभ उसी अचल सद्भाव के संकल्प से करता है।
स्रोत: सूर्य नमस्कार मंत्र-क्रम (सूर्य के पारंपरिक बारह नाम)
समापन गायत्री
गायत्री से समापन — सूर्य से आकाश नहीं, बुद्धि के प्रकाश की प्रार्थना।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
Oṁ bhūr bhuvaḥ svaḥ tat savitur vareṇyaṁ bhargo devasya dhīmahi dhiyo yo naḥ pracodayāt
हम सविता देव के सर्वश्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं — वह प्रकाश हमारी धी (बुद्धि) को जगाए। प्रार्थना तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः) साथ रखती है, और उनमें माँगती है केवल एक वस्तु: धी — विवेक की शक्ति। बाहरी कुछ भी नहीं माँगा गया। यह परंपरा का सबसे साहसी दाँव है, हर सूर्योदय पर नया — मनुष्य को एक प्रदीप्त बुद्धि दे दो, शेष सब उसी से आ जाता है।
स्रोत: ऋग्वेद ३.६२.१० (यजुर्वेद की व्याहृतियों सहित)
एक क्षण स्थिरता
करबद्ध, कोमल दृष्टि, मिले हुए दिन के लिए एक कृतज्ञ श्वास। बस — चाय से पहले, फ़ोन से पहले।
टिप्पणी: सूर्य को कभी सीधे न देखें। अर्पित जल पौधे या पात्र में जाए (नाली में नहीं) — बहुत से लोग तुलसी या क्यारी में अर्पण करते हैं।