सार्वभौम
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
Oṁ bhūr bhuvaḥ svaḥ tat savitur vareṇyaṁ bhargo devasya dhīmahi dhiyo yo naḥ pracodayāt
सरल उच्चारण: Om bhoor bhu-vah svah, tat sa-vi-tur va-ren-yam, bhar-go de-vas-ya dhee-ma-hi, dhi-yo yo nah pra-cho-da-yaat
इस मंत्र के विषय में
वेदों की सर्वाधिक पूजनीय ऋचाओं में से एक — सविता देव (सूर्य के प्राणदायी तेज) से बुद्धि को जगाने और प्रेरित करने की प्रार्थना।
अर्थ
हम सविता देव के सर्वश्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं — वह प्रकाश हमारी धी (बुद्धि) को जगाए। प्रार्थना तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः) साथ रखती है, और उनमें माँगती है केवल एक वस्तु: धी — विवेक की शक्ति। बाहरी कुछ भी नहीं माँगा गया। यह परंपरा का सबसे साहसी दाँव है, हर सूर्योदय पर नया — मनुष्य को एक प्रदीप्त बुद्धि दे दो, शेष सब उसी से आ जाता है।
कब जपें
संध्या का मंत्र — परंपरा से सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त पर; १०, २८ या १०८ की गिनती में। उपनयन इसी से जीवन-भर का आरंभ करता है; विद्यार्थी और साधक इसे नित्य रखते हैं।
शब्द-दर-शब्द
- भूर्भुवः स्वःbhūr bhuvaḥ svaḥ
- पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग — तीनों लोक
- तत्tat
- उस
- सवितुःsavituḥ
- प्राणदायी सविता (सूर्य) के
- वरेण्यंvareṇyaṁ
- सर्वश्रेष्ठ, वरण करने योग्य
- भर्गःbhargaḥ
- तेज, दिव्य प्रकाश
- देवस्यdevasya
- देव के
- धीमहिdhīmahi
- हम ध्यान करते हैं
- धियो यो नःdhiyo yo naḥ
- जो हमारी बुद्धियों को
- प्रचोदयात्pracodayāt
- प्रेरित करे
स्रोत: ऋग्वेद ३.६२.१० (यजुर्वेद की व्याहृतियों सहित)

