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शवासन

शव = निष्प्राण देह — पूर्ण स्थिर लेटना

सबसे कठिन आसन: पूर्णता से, बिल्कुल कुछ न करना।

कोमलअवधि: अभ्यास के बाद 5–10 मिनट; सिर के नीचे मुड़ा कम्बल रख सकते हैं।

सबसे सरल शब्दों में

पीठ के बल तारामछली की तरह लेट जाओ और बिल्कुल स्थिर रहो — पर सोना नहीं! बस महसूस करो कि साँस अपने-आप आ-जा रही है। यही वह आसन है जिसमें शरीर बाकी सब आसनों के लिए "धन्यवाद" कहता है।

यह क्या है

हर अभ्यास यहीं समाप्त होता है: पीठ के बल, अंग छूटे हुए, आँखें बंद, शरीर अपने नाम जितना स्थिर। शवासन में ही अभ्यास का सारा श्रम जज़्ब होता है — गुरु इसे यों ही अनिवार्य नहीं कहते। स्थिरता केवल शरीर की है: भीतर ध्यान कोमलता से जागा रहता है, अपने-आप आती-जाती साँस को देखता हुआ। इसके पाँच सच्चे मिनट उतना लौटा देते हैं जितना घंटे भर का मोबाइल कभी नहीं लौटाएगा।

अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि

गर्भावस्था के अंतिम चरण में बाईं करवट लेटें (घुटनों के बीच तकिया)। कमर कष्ट दे तो घुटनों के नीचे गद्दी रखें।

आसन में कैसे आएँ

  1. पीठ के बल लेटें, टाँगें थोड़ी अलग और बाहर की ओर ढली, बाँहें शरीर से दूर, हथेलियाँ ऊपर।

  2. कंधे हल्के नीचे समेट लें; गर्दन का पिछला भाग लम्बा करें।

  3. आँखें बंद कर शरीर को अंग-अंग छोड़ते जाएँ, चेहरा भी — जबड़ा, जीभ, भौंहें।

  4. साँस को अपने-आप चलने दें; केवल देखते रहें।

  5. बाहर आने के लिए साँस गहरी करें, उँगलियाँ हिलाएँ, दाईं करवट लें, और धीरे-धीरे उठें।

श्वास

कोई विधि नहीं — केवल सहज साँस, देखी हुई।

किसलिए किया जाता है

अभ्यास का आत्मसात, गहन विश्राम, योग निद्रा का द्वार।

इन क्रमों का अंग