
मंत्र और जप
एक पवित्र वाक्य, ध्यानपूर्वक दोहराया हुआ — प्रायः 108 बार, माला पर गिनते हुए।
मंत्र एक ध्वनि या वाक्य है, प्रायः संस्कृत में, जिसके बारे में मान्यता है कि ध्यानपूर्वक दोहराने पर वह शक्ति रखता है। शब्द की पारम्परिक व्याख्या: जो मनन करने वाले (मन्) की रक्षा (त्र) करे। कुछ मंत्र एक अक्षर के बीज हैं — ॐ, गं, श्रीं। कुछ नाम हैं: "ॐ नमः शिवाय"। कुछ पूरे श्लोक हैं, जैसे गायत्री।
जप वह दोहराना है। इसे 108 मनकों की माला पर गिना जाता है — अँगूठे और मध्यमा से एक-एक मनका सरकाते हुए; अन्त का बड़ा मनका (सुमेरु) एक पूरी माला का संकेत है। 108 ही क्यों? परम्परा कई कारण देती है और कोई एक सर्वमान्य नहीं — इसलिए इसे प्रथागत गिनती मानें, कोई सूत्र नहीं।
गीता में कृष्ण कहते हैं: "यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ" (10.25) — शान्त दोहराव सबसे बड़े अग्नि-यज्ञ के बराबर रखा गया है।
शुरुआत कैसे करें: एक मंत्र चुनें, उसका अर्थ जानें, और एक सप्ताह तक रोज़ एक ही समय पर ग्यारह बार दोहराएँ — बोलकर या मन में। गति और आवाज़ मायने नहीं रखतीं; ध्यान रखता है। धरमकिरा का हर मंत्र देवनागरी पाठ, सरल उच्चारण, अर्थ और एक काउंटर के साथ है, जो गिनती आपके लिए रखता है।
परंपरा के अपने शब्दों में
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
maharṣīṇāṃ bhṛgur ahaṃ girām asmy ekam akṣaram, yajñānāṃ japa-yajño 'smi sthāvarāṇāṃ himālayaḥ
महर्षियों में मैं भृगु हूँ; वाणी में एक अक्षर; यज्ञों में जप-यज्ञ; और स्थिर वस्तुओं में हिमालय।
एक नज़र में
यह कहाँ से आता है
पारम्परिक व्युत्पत्ति: मननात् त्रायते इति मन्त्रः। भगवद्गीता 10.25।