
पार्वती-शिव · सूर्योदय से अगली प्रातः; प्रदोष-पूजा 60–90 मिनट
हरतालिका तीज व्रत
भाद्रपद शुक्ल तृतीया (14 सितंबर 2026; 3 सितंबर 2027)
सबसे सरल शब्दों में
स्वयं पार्वती का व्रत, सबसे कठोर — पति या भावी पति के लिए (प्रायः निर्जल) एक दिन, मिट्टी की मूर्ति और रतजगे के गीतों संग।
तीजों में कठोरतम यह व्रत पार्वती के वन-तप को फिर जीता है: अपने ही हाथों बालू/मिट्टी से रचा शिवलिंग, संध्या-भर पूजा, रात्रि-भर जागरण। यह मन के साथी के लिए है — विवाहिताएँ प्रिय हेतु, कुँवारियाँ स्वयं पार्वती के चरण-चिह्नों पर।
सामग्री
0/4 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/6 पूर्णभोर का निर्जल संकल्प
यथाशक्ति संकल्प — पूर्ण स्वस्थ हों तो निर्जल; अन्यथा उसी भाव से सजल/फलाहार।
विग्रह-रचना
अपराह्न में अपने हाथों बालू/मिट्टी से शिवलिंग और लघु गौरी रचें — व्रत का मुख्य कर्म; पार्वती ने भी ऐसे ही रचा था।
प्रदोष शृंगार-पूजा
गोधूलि में फुलेरा तले: गौरी को पूर्ण सुहाग-सामग्री, शिव को बेल-धतूरा-शमी; धूप-दीप और नैवेद्य; यथाशक्ति षोडशोपचार।
ॐ पार्वत्यै नमः
Oṁ Pārvatyai Namaḥ
ॐ, पर्वत-पुत्री पार्वती को प्रणाम। नाम ही उनका जन्म है: 'पर्वत' से पार्वती — सती, जो शिव को फिर पाने के लिए हिमवान की पुत्री बनकर जन्मीं; यही कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, पार्वती खण्ड) और कालिदास का कुमारसम्भव कहते हैं। साधक शक्ति के सौम्यतम रूप को नमन करता है: सहधर्मिणी, माता, और वह अर्धांग जिसके बिना योगी पूर्ण नहीं।
स्रोत: पारंपरिक नाम-मंत्र
कथा
हरतालिका कथा — सखी-हरण, वन-प्रतिज्ञा — का पाठ; श्रवण को व्रत-तुल्य कहा गया है।
रात्रि-प्रहर
परंपरा से रात्रि प्रहर-दर-प्रहर भजन में, हर प्रहर आरती। जितना बल सच में साथ दे, उतना निभाएँ।
ॐ नमः शिवाय
Oṁ Namaḥ Śivāya
मैं शिव को प्रणाम करता हूँ — मंगलमय को। 'शिव' उसका नाम है जो नित्य-कल्याणमय और नित्य-शुद्ध है: शांति के स्वामी नहीं, स्वयं शांति — अनुभव की हर लहर के नीचे का आधार। 'न-मः-शि-वा-य' — ये पाँच अक्षर पंच महाभूतों के प्रतिरूप माने जाते हैं; पृथ्वी से आकाश तक पूरा व्यक्तित्व एक ही प्रणाम में समा जाता है। कुछ माँगा नहीं जाता — यह वह विरल प्रार्थना है जिसकी समूची सामग्री समर्पण है।
स्रोत: तैत्तिरीय संहिता ४.५.८ — श्रीरुद्रम्, अनुवाक ८ ('नमः शिवाय च शिवतराय च'), कृष्ण यजुर्वेद
प्रातः विसर्जन-पारण
प्रातः आरती; मृण्मय विग्रह सधन्यवाद जल में विसर्जित; बड़ों के हाथ जल से पारण।
टिप्पणी: 2026 की तिथि में वास्तविक मत-भेद है (13/14 सितंबर — पर्व-प्रविष्टि देखें)। कर्नाटक इसी तिथि को गौरी हब्बा की अपनी विधि से मनाता है; उ.प्र., बिहार, राजस्थान, म.प्र., महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ हरतालिका। स्वास्थ्य सदा कठोरता से पहले।