
पार्वती और शिव
हरतालिका तीज
तीजों में कठोरतम — पार्वती का अपना निर्जला व्रत, बालू के शिवलिंग के साथ।
तिथि: भाद्रपद शुक्ल तृतीया
सबसे सरल शब्दों में
सबसे कठोर तीज — जब सखियों ने पार्वती को छिपा लिया ताकि वे केवल शिव को वरने का प्रण निभा सकें। संकल्प का उत्सव।
कथा और उद्देश्य
हरत-आलिका — 'सखी द्वारा हरण': जब पर्वतराज ने पार्वती का संबंध विष्णु से ठहराया, तो सखी उन्हें घने वन में ले गई, जहाँ उन्होंने नदी की बालू का शिवलिंग रचकर बिना अन्न-जल दिन-रात आराधना की। शिव आए, और वचन दिया। यह व्रत उसी परम-संकल्प की रात को फिर जीता है।
यह तीनों तीजों में सबसे कठोर है — स्वास्थ्य अनुमति दे तो निर्जला — जो स्त्रियाँ मन-चुने साथी और उसकी दीर्घायु के लिए रखती हैं। बालू/मिट्टी का शिवलिंग, संग गौरी; रात्रि-जागरण में कथा-गीत; प्रातः विसर्जन से वृत्त पूर्ण।
क्या किया जाता है
बालू का शिवलिंग
बालू या मिट्टी से शिव-गौरी रचकर प्रदोष काल में शृंगार-पूजन।
निर्जला व्रत
यथाशक्ति — शास्त्र कठोरता से पहले स्वास्थ्य रखता है।
रात्रि जागरण
रात्रि-प्रहरों में कथा, भोर तक भजन।
विसर्जन और पारण
प्रातः पूजन, प्रतिमा-विसर्जन, फिर पारण।
श्रेष्ठ समय
पूजा प्रदोष काल से; व्रत अगली प्रातः तक।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
2026 में तृतीया गणेश चतुर्थी से सट गई है — तीज और गणपति 14 सितंबर को साथ पधारते हैं।
नेपाल और मिथिला में यह वर्ष का महान स्त्री-पर्व है — पशुपतिनाथ लाल साड़ियों से भर उठता है।
कर्नाटक इसी तिथि को 'गौरी हब्बा' मनाता है — पुत्र के आगमन से एक दिन पूर्व गौरी का गृह-आगमन।
इस पर्व के मंत्र
टिप्पणी: 2026 के कुछ पंचांग (और अमेरिकी समय-क्षेत्र के कैलेंडर) 13 सितंबर मानते हैं; भारत की प्रचलित तिथि 14 सितंबर है। कर्नाटक का गौरी हब्बा इसी तिथि पर है।