
विष्णु — रंगनाथ, वेंकटेश्वर
वैकुंठ एकादशी
उत्तर द्वार खुलता है — एक दिन, जब वैकुंठ का द्वार दृश्य रूप से खुला रहता है।
तिथि: सौर धनुर्/मार्गऴि मास की शुक्ल एकादशी।
सबसे सरल शब्दों में
दक्षिण की महानतम एकादशी — मंदिरों का विशेष उत्तर-द्वार खुलता है, और उससे गुज़रना मानो वैकुण्ठ के द्वार से गुज़रना है।
कथा और उद्देश्य
इस एकादशी को वैकुंठ द्वारम् — विष्णु मंदिरों का वर्ष-भर बंद उत्तर द्वार — खोला जाता है, और प्रभु-नाम सहित उससे निकलना स्वयं वैकुंठ-द्वार से निकलना माना गया है। श्रीरंगम् में भोर के समय स्वयं रंगनाथ लाखों के सम्मुख 'परमपद वासल' से पधारते हैं; तिरुमला की पंक्ति वर्ष की सबसे लंबी होती है।
उत्तर में यही मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी 'मोक्षदा' है — स्वयं गीता का दिन। मुरासुर-कथा व्रत का नाम-तत्त्व देती है: विष्णु की योगनिद्रा के तेज से प्रकटी एकादशी देवी ने प्रभु के शयन में ही असुर को गिरा दिया — अतः इस दिन का जागरण उन्हीं का है।
क्या किया जाता है
वैकुंठ द्वारम्
विष्णु मंदिर के खुले उत्तर द्वार से दर्शन-गमन; घर पर भोर में दीपों संग वेदी का 'द्वार' खोलना।
उपवास और जागरण
कठोर एकादशी व्रत; रात्रि-जागरण, विष्णु नाम-संकीर्तन।
गीता पाठ
गीता जयंती से मिलन पर — एक अध्याय या संपूर्ण पाठ।
श्रेष्ठ समय
द्वार-दर्शन भोर में; व्रत अगली प्रातः पारण तक।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
श्रीरंगम् का उत्सव इक्कीस दिन चलता है — दस दिन के, दस रात्रि के, मध्य में द्वार।
इसी सत्र में आळ्वार तिरुनगरि में नम्माळ्वार का वैकुंठ-आरोहण मंचित होता है।
2027-28 का सत्र 8 जनवरी 2028 को पड़ता है — धनुर्मास की एकादशी कैलेंडर-वर्ष 2027 को पूरी तरह छोड़ जाती है।