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Dharamkira
पूजा विधि
जल पर शेषनाग की कुंडली पर विराजमान विष्णु, पीछे उठे नाग-फन, दोनों ओर उनकी पत्नियाँ — राजा रवि वर्मा पर आधारित क्रोमोलिथोग्राफ।
शेष पर अपनी दो पत्नियों सहित विष्णुराजा रवि वर्मा के चित्र पर आधारित क्रोमोलिथोग्राफ, c. 1890s

भगवान विष्णु · सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक

एकादशी व्रत — पाक्षिक उपवास

प्रत्येक पक्ष की एकादशी — कैलेंडर की एकादशी प्रविष्टियाँ देखें

सबसे सरल शब्दों में

महीने में दो बार, सामान्य से हल्का दिन — अन्न नहीं, विष्णु-स्मरण अधिक, और अगली सुबह सही समय पर पारण।

मास में दो बार परंपरा विष्णु के लिए एक दिन रिक्त करती है: अल्प या निराहार, अधिक स्मरण, कम कोलाहल। देह पाचन को विश्राम देती है, मन चाह की पकड़ ढीली करता है — व्रत पाक्षिक पुनरारंभ है, और कठोरता सामर्थ्य तय करती है।

व्रत के नामित स्तर हैं: निर्जल (जल भी नहीं), सजल (केवल जल), फलाहार (फल-दूध), और एक अन्न-रहित भोजन। स्तर चुनना संकल्प का अंग है; अगली प्रातः पंचांग के पारण-काल में समापन — वर्ष में चौबीस ऐसे दिन, अधिक मास पड़े तो छब्बीस।

यह पूजा करें

5 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/4 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/5 पूर्ण
  1. सूर्योदय संकल्प

    स्नान कर विष्णु-सम्मुख संकल्प लें: व्रत का स्तर (निर्जल केवल पूर्ण स्वस्थ हों तो; अधिकांश हेतु जल-फल; एक अन्न-रहित भोजन भी मान्य), और किसके कल्याण हेतु।

  2. प्रातः विष्णु पूजा

    दीप, चंदन, पुष्प, तुलसीदल और द्वादशाक्षर मंत्र — दिन का आधार प्रातः ही स्थापित।

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    Oṁ Namo Bhagavate Vāsudevāya

    ॐ, भगवान वासुदेव को प्रणाम। वासुदेव अंतर्यामी कृष्ण हैं — 'वस्' धातु से: जिनमें सब प्राणी बसते हैं और जो सब प्राणियों में बसते हैं। बारह अक्षरों का यह मंत्र भागवत परंपरा का पूरा पथ एक पंक्ति में है — कोई माँग नहीं, एक संबोधन: भगवान के व्यक्तित्व की ओर मुड़ना और स्वयं को सौंप देना।

    स्रोत: भागवत परंपरा (श्रीमद्भागवत पुराण)

  3. दिन-भर

    लिया हुआ आहार-नियम निभाएँ; वाणी सौम्य-संयत रहे; रिक्त क्षण फ़ीड नहीं, नाम से भरें। एकादशी को चावल परंपरा से सभी छोड़ते हैं — व्रती न भी हों।

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

    Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare, Hare Rāma Hare Rāma, Rāma Rāma Hare Hare

    हरे, कृष्ण, राम — तीन नाम, सोलह बार, एक ही माला में गुँथे। 'हरे' हरि — दुःख हर लेने वाले — की पुकार है, अथवा गौड़ीय पाठ में 'हरा' — भगवद्-शक्ति, राधा — की; 'कृष्ण' सर्व-आकर्षक; 'राम' आनन्द के आगार। पूरे मंत्र में कहीं कोई माँग नहीं: यह शुद्ध संबोधन है — प्रियतम को नाम से पुकारते रहने की साधना, जब तक पुकार ही मिलन न बन जाए।

    स्रोत: कलिसंतरण उपनिषद

  4. संध्या दीप-कथा

    गोधूलि दीप; उस एकादशी की कथा या गीता-अंश का पाठ; शयन-पूर्व एक शांत माला। महाएकादशियों पर कुछ भक्त आंशिक/पूर्ण जागरण रखते हैं।

    अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात् । नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥

    Acyutānanta-govinda nāmoccāraṇa-bheṣajāt, naśyanti sakalā rogāḥ satyaṁ satyaṁ vadāmy aham

    अच्युत, अनन्त, गोविन्द — इन नामों के उच्चारण रूपी औषध से समस्त रोग नष्ट होते हैं — मैं सत्य कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। तीन नाम तीन औषधियों की तरह चुने गए हैं: जो कभी च्युत नहीं होते (जब देह साथ छोड़े), जो अनन्त हैं (जब समय दबाए), जो अपने गोधन को सँभालते हैं (जब कोई सुध न ले)। और दोहराया गया 'सत्यं' — सत्य, सत्य — श्लोक का अपने ही वचन पर लगाया गया दाँव है।

    स्रोत: विष्णु-नाम परंपरा का पारंपरिक आरोग्य-श्लोक

  5. पारण — विधिवत् समापन

    अगली प्रातः सूर्योदय-पश्चात् पारण-काल में (पंचांग में उल्लिखित) व्रत सौम्यता से खोलें — पहले जल-फल। समापन दान से: भरपेट से पहले अन्न-दान।

टिप्पणी: स्वास्थ्य सर्वप्रथम: मधुमेही, गर्भवती, रोगी, बच्चे व्रत घटाएँ या छोड़ें — भाव कठोरता से बड़ा है, और शास्त्र स्वयं विकल्प देता है (जप, दान, अतिरिक्त सेवा)।

टिप्पणी: स्मार्त-वैष्णव पारण-नियम किंचित भिन्न हैं; परिवार अपना पंचांग मानें।

निर्जला एकादशीदेवशयनी एकादशीदेवउठनी एकादशीवैकुंठ एकादशी