
भगवान विष्णु
निर्जला एकादशी
जल तक का त्याग — एक दिन, जिसका पुण्य चौबीसों एकादशियों के बराबर।
तिथि: ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
सबसे सरल शब्दों में
सबसे कठिन एकादशी — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक अन्न भी नहीं, जल भी नहीं। कहते हैं यह एक रखने से चौबीसों का फल मिलता है। स्वास्थ्य सदा पहले है।
कथा और उद्देश्य
वर्ष की एकादशियों में यह शिखर है — ज्येष्ठ की प्रचंडतम गर्मी में, जल तक के बिना। परंपरा इसे भीम एकादशी कहती है: पाक्षिक उपवास न कर पाने वाले भीम ने व्यास जी से एक ऐसा व्रत माँगा जो सबका फल दे — उन्हें यही कठोरतम और पूर्णतम व्रत मिला।
इसका बाह्य रूप है जल-दान: भक्त स्वयं प्यासा रहता है, इसीलिए यह दिन दूसरों को जल पिलाने से छलकता है — राह-किनारे प्याऊ, मिठाई-सहित कलश-दान, पशु-पक्षियों के लिए जल। भीतर का तप बाहर उदारता बन जाता है।
क्या किया जाता है
निर्जल व्रत
सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक अन्न-जल त्याग — केवल स्वास्थ्य-अनुसार; फलाहार या सजल व्रत भी मान्य।
विष्णु पूजा
विष्णु को तुलसी, पुष्प, दीप; सहस्रनाम या द्वादशाक्षर मंत्र।
जल-दान
जल, मटके, शरबत, पंखे का दान — इस दिन की पहचान।
पारण
अगली प्रातः पारण-काल में व्रत-समापन — सबसे पहले जल।
श्रेष्ठ समय
संकल्प सूर्योदय पर; संध्या को जागरण या दीर्घ जप; पारण अगली प्रातः।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
मान्यता है कि एकादशी-व्रत मास में दो बार पाचन को विश्राम देता है — पंचांग को शरीर की देखभाल की तरह पढ़ना।
पारण द्वादशी तिथि के भीतर और उसके प्रथम चतुर्थांश (हरि वासर) के बीतने के बाद होना चाहिए — इसीलिए पंचांग हर एकादशी का पारण-काल छापते हैं।
आज लगी प्याऊ प्रायः पूरी ग्रीष्म चलती है — एक व्रत, जल की पूरी ऋतु।