
शिव, पीपल और पितृगण
सोमवती अमावस्या
दुर्लभ सोमवारी अमावस्या — स्नान, पीपल-परिक्रमा, और दुगुने समीप पितृगण।
तिथि: सोमवार को पड़ने वाली कोई भी अमावस्या
सबसे सरल शब्दों में
सोमवार को पड़ने वाली दुर्लभ अमावस्या — शिव का दिन और पितरों का दिन मिल जाते हैं, और उसकी शांत प्रार्थनाएँ दुगुनी प्रिय हो जाती हैं।
कथा और उद्देश्य
जब सोम — चंद्र — के अपने वार पर चंद्र ही न हो, तो परंपरा एक विशेष स्थिरता पढ़ती है: सोमवती अमावस्या, वर्ष में केवल दो-तीन बार। परंपरा — महाभारत में भीष्म के युधिष्ठिर को दिए उपदेश का हवाला देते हुए — मानती है कि इस दिन तीर्थ-स्नान समृद्धि देता और पितरों को मुक्त करता है; कुछ इसका पुण्य सूर्यग्रहण-स्नान तुल्य गिनते हैं।
सुहागिनें पीपल की परिक्रमा करती हैं — मूल में विष्णु, शिखर में शिव, श्वास में पितर — पति की आयु के लिए तने पर कच्चे सूत के 108 फेरे। यह व्रतों में सबसे शांत है: जल, एक वृक्ष, मौन, और वंश-परंपरा।
क्या किया जाता है
स्नान-दान
भोर में नदी/तीर्थ-स्नान; तत्पश्चात तिल, अन्न, वस्त्र दान।
पीपल परिक्रमा
सूत्र सहित 108 (या यथाशक्ति) परिक्रमा; मूल में जल, एक दीप।
पितृ तर्पण
दक्षिणाभिमुख जल-तिल — अमावस्या का स्थायी पितृ-कर्तव्य।
मौन और जाप
मौन में ॐ नमः शिवाय — सोमवार का अपना मंत्र।
श्रेष्ठ समय
स्नान-परिक्रमा प्रातः; तर्पण मध्याह्न-पूर्व।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
अगस्त के बाद 2026 में कोई सोमवती नहीं — अगली तीन 2027 में हैं (8 मार्च, 2 अगस्त, 27 दिसंबर)।
अगस्त 2027 की सोमवती श्रावण सोमवार भी है — व्रतों का दुर्लभ संयोग।
बड़ी सोमवती पर हरिद्वार और प्रयाग में लाखों स्नानार्थी उमड़ते हैं — कुंभ से इतर वर्ष के सबसे बड़े स्नान-दिवसों में।