सेतुबंधासन
सेतुबंधासन — सेतु मुद्रा
सेतु = पुल, बंध = बाँधना — पुल का निर्माण
लेटे-लेटे कूल्हे उठते हैं और शरीर सेतु बन जाता है — नीचे दृढ़, ऊपर खुला।
सबसे सरल शब्दों में
पीठ के बल लेटो, घुटने मोड़ो, और कूल्हों को छत की ओर उठाओ — शरीर एक पुल बन जाए। नीचे से गाड़ियाँ निकल सकती हैं! रुको, फिर पुल की तरह धीरे-धीरे नीचे आ जाओ।
यह क्या है
पीठ के बल, घुटने मुड़े और पैर जमे हुए, कूल्हे ऊपर उठते हैं और शरीर कंधों से घुटनों तक सेतु-सा तन जाता है। श्रम टाँगें और नितम्ब करते हैं, छाती ठुड्डी की ओर खुलती है — ऐसा पश्च-वक्र जो जितना खींचता है उतना ही सबल बनाता है। नाम उस सेतु की याद दिलाता है जो श्रीराम की वानर सेना ने लंका तक सागर पर बाँधा था: अनेक छोटे पत्थर, एक मार्ग। संध्या का अभ्यास इसे दिन भर की कुर्सी-आकृति के प्रतिकार रूप में अपनाता है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
कूल्हे उठे हों तब सिर कभी न घुमाएँ (गर्दन पर भार होता है)। गर्दन या गम्भीर पीठ-चोट में न करें; गर्भावस्था के अंतिम चरण में सहारे के साथ थोड़ा ही उठें।
आसन में कैसे आएँ
पीठ के बल लेटें, घुटने मुड़े, पैर कूल्हों जितने खुले और उनके पास, बाँहें बगल में, हथेलियाँ नीचे।
पैरों को दबाते हुए साँस लें और कूल्हे उठाएँ।
कंधों को हल्का नीचे मोड़ें; घुटने सीधे आगे की ओर रहें।
आकृति में सम साँस लें, छाती चौड़ी, गला कोमल।
साँस छोड़ते हुए रीढ़ को धीरे-धीरे, एक-एक मनका, नीचे उतारें।
श्वास
साँस लेते हुए उठें, सम साँस में ठहरें, छोड़ते हुए पिघलकर उतरें।
किसलिए किया जाता है
टाँगों, कूल्हों और पीठ की शक्ति; लम्बी बैठक के बाद छाती का खुलना; गहरे पश्च-वक्रों का शांत रूप।