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Dharamkira
पूजा विधि
खुले केश और माला धारण किए, खड्ग उठाए, लेटे हुए शिव पर खड़ी श्याम-वर्णा देवी काली — रवि वर्मा प्रेस का चित्र।
कालीराजा रवि वर्मा / रवि वर्मा प्रेस, c. 1910

काली (श्यामा, दक्षिणा काली) · 45 मिनट, रात्रि

गृह काली पूजा — गृहस्थ की श्यामा

कार्तिक अमावस्या — दीपावली रात्रि (8 नवंबर 2026; 29 अक्तूबर 2027)

सबसे सरल शब्दों में

घर पर उग्र माँ की कोमल पूजा — लाल जबा (गुड़हल) फूल, सच्चा हृदय, मध्यरात्रि का दीप — काली उनकी रक्षा करती हैं जो उनसे कुछ नहीं छिपाते।

जिन माँ को बंगाल मध्यरात्रि में पुकारता है, उनकी गृह-पूजा शुद्ध भक्ति-भाव से होती है — कोई तांत्रिक उपकरण नहीं, केवल वह संतान-भाव जो रामकृष्ण ने दिखाया: मिलें तो जबा (गुड़हल) पुष्प, निष्कपटता — क्योंकि और कुछ वे स्वीकारती ही नहीं — और निर्भय होकर लिया गया उनका नाम।

यह पूजा करें

5 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/4 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/5 पूर्ण
  1. रात्रि स्थापना

    (लक्ष्मी-पूजन के बाद) माँ का चित्र दीप-धूप सहित स्थापित; घर में केवल लौ का प्रकाश — उनकी अमावस्या-शोभा।

  2. पुष्प-सिंदूर

    जबा-माला या लाल पुष्प; प्रतिमा को सिंदूर, फिर इच्छुक गृह-स्त्रियों को।

  3. क्रीं जाप

    उनके बीज की 108 आवृत्ति — स्थिर, सप्रेम, निर्भय। भय उठे तो समझिए अहं अपनी माँ से मिला है; कोमलता से जारी रखें।

    ॐ क्रीं कालिकायै नमः

    Oṁ Krīṁ Kālikāyai Namaḥ

    ॐ — क्रीं — कालिका को प्रणाम। बीजाक्षर तीखा है, क्योंकि वे भी हैं: काली साक्षात् काल हैं — वह माँ जो समाप्त हो चुके का अंत करती हैं, ताकि जिसे जीना है वह जी सके। उनके भक्त इस प्रचंडता को पूर्ण बल पर पहुँची ममता कहते हैं। साधक अपने सबसे बड़े भय — अंत — को प्रणाम करता है, और उस पर माँ का मुख पाता है।

    स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र

  4. या देवी पाठ

    तंत्रोक्तम् श्लोक — सर्वभूतों में चेतना, शक्ति, शांति रूपा देवी को प्रणाम।

    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

    Yā devī sarva-bhūteṣu śakti-rūpeṇa saṁsthitā, namas tasyai namas tasyai namas tasyai namo namaḥ

    जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं — उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें बारंबार नमस्कार। स्तुति का व्याकरण ही उसकी शिक्षा है: देवी कहीं और से नहीं बुलाई जातीं — वे हर प्राणी में पहले से 'संस्थिता' मिलती हैं, स्वयं शक्ति रूप में। तीन बार का नमन उस उपस्थिति को है जो उन प्राणियों में मिली, जिन्हें अब तक केवल देखा भर था।

    स्रोत: दुर्गा सप्तशती, अध्याय ५ (देवी माहात्म्य)

  5. भोग-आरती

    खीर/खिचुड़ी, फल, बताशा भोग; कर्पूर-आरती; कुल में प्रचलित हो तो श्यामा-संगीत। प्रसाद उन्हीं की साँवली, ऊष्म शांति में।

टिप्पणी: न्यास आदि तांत्रिक विधि दीक्षित परंपराओं-पुरोहितों की है — यह गृहस्थ-रूप अपने आप में पूर्ण है, जैसा दक्षिणेश्वर का अपना भाव दिखाता है। गृह-विधान में पशु-बलि का स्थान नहीं; यहाँ फल ही उनकी बलि हैं।

काली पूजादीपावली · लक्ष्मी पूजन