
श्रीकृष्ण
विषु
वर्ष का आरंभ उसी से जो आँखें सबसे पहले देखें — श्रीकृष्ण के सम्मुख एक स्वर्णिम सजावट।
तिथि: मेडम 1 — मलयालम सौर नववर्ष।
सबसे सरल शब्दों में
केरल का नववर्ष एक अचरज से शुरू होता है: आँखें बंद कराकर 'कणि' के दर्शन — कृष्ण, फल और दीपों की सुनहरी सजावट — ताकि साल की पहली नज़र सुंदरता पर पड़े।
कथा और उद्देश्य
विषु एक ही सुंदर विचार पर टिका है: वर्ष का रंग उसकी पहली दृष्टि से तय होगा। इसलिए पूर्व रात्रि परिवार श्रीकृष्ण के सम्मुख 'विषुक्कणि' — 'प्रथम दर्शन' — सजाता है: सुनहरे कोन्ना पुष्प, अक्षत, वालक्कण्णाडि (दर्पण), फल, सिक्के, जलता दीप। भोर में हर सदस्य आँखें मूँदे वहाँ लाया जाता है।
फिर बड़े छोटों की हथेली में 'विषुक्कैनीट्टम्' — सिक्के — रखते हैं: वर्ष का पहला कर्म देना है। दोपहर सद्या (भोज) की है, और कणि के दर्पण में हर चेहरा स्वयं को वर्ष की समृद्धि का अंश देखता है।
क्या किया जाता है
विषुक्कणि
पूर्व रात्रि उरुली में श्रीकृष्ण के सम्मुख सजाई जाती है; भोर में मूँदी-फिर-खुली आँखों से प्रथम दर्शन।
विषुक्कैनीट्टम्
बड़े बच्चों और परिजनों को सिक्के देते हैं — पहले ही दिन समृद्धि प्रवाहित।
सद्या
केले के पत्ते पर भोज — ऋतु के पहले आम-कटहल सहित।
कृष्ण जाप
कणि के सम्मुख ॐ क्लीं कृष्णाय नमः अथवा गोपाल मंत्र।
श्रेष्ठ समय
कणि-दर्शन ब्राह्म मुहूर्त में — दिन की किसी भी अन्य वस्तु से पहले।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
कणि-कोन्ना (अमलतास) ठीक विषु पर फूलता है — केरल की राहें सुनहरी हो जाती हैं।
गुरुवायूर की विषुक्कणि के भोर-पूर्व दर्शन को लाखों जुटते हैं।
विषु का अर्थ 'सम' है — विषुव (दिन-रात की समानता) की प्राचीन स्मृति, जो कभी इसी दिन पड़ता था।