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मंत्र संग्रह

कृष्ण

कृष्णाय वासुदेवाय

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

Kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane, praṇata-kleśa-nāśāya govindāya namo namaḥ

सरल उच्चारण: Krish-naa-ya vaa-su-de-vaa-ya ha-ra-ye pa-ra-maat-ma-ne, pra-na-ta kle-sha naa-shaa-ya go-vin-daa-ya na-mo na-mah

भक्तिरक्षाशांति

इस मंत्र के विषय में

श्रीमद्भागवत (१०.७३.१६) की कृष्ण-वन्दना — जरासंध के कारागार से मुक्त हुए राजाओं के मुख से; तब से भागवत-पाठ के मंगलाचरण के रूप में पढ़ी जाती है।

अर्थ

कृष्ण को, वासुदेव को, हरि परमात्मा को; शरणागतों के क्लेश नष्ट करने वाले गोविन्द को — बारंबार नमस्कार। मुक्त हुए राजा इसे तब कहते हैं, जब बेड़ियाँ अभी-अभी खुली हैं; और इसका आश्वासन एक ही समास में बैठा है: प्रणत-क्लेश-नाशाय — शरणागतों के क्लेश नष्ट करने वाले। हमारा भाग केवल प्रणत होना है; नाश करना उनका।

कब जपें

भागवत-पाठ या कथा से पहले, जन्माष्टमी पर, और क्लेश से शरण लेने की किसी भी घड़ी में पढ़ा जाता है।

शब्द-दर-शब्द

कृष्णाय वासुदेवायkṛṣṇāya vāsudevāya
कृष्ण, वासुदेव के लिए
हरये परमात्मनेharaye paramātmane
हरि परमात्मा के लिए
प्रणतक्लेशनाशायpraṇata-kleśa-nāśāya
शरणागतों के क्लेश नष्ट करने वाले
गोविन्दाय नमो नमःgovindāya namo namaḥ
गोविन्द को बारंबार नमस्कार

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण १०.७३.१६ (जरासंध से मुक्त राजाओं की स्तुति); भागवत-पाठ से पहले मंगलाचरण के रूप में प्रचलित

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

Kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane, praṇata-kleśa-nāśāya govindāya namo namaḥ

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