कृष्ण
गोपाल मंत्र — अष्टादशाक्षर
क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा
Klīṁ kṛṣṇāya govindāya gopījana-vallabhāya svāhā
सरल उच्चारण: Kleem krish-naa-ya go-vin-daa-ya go-pee-ja-na val-la-bhaa-ya svaa-haa
इस मंत्र के विषय में
गोपाल तापनीय उपनिषद का अष्टादशाक्षर गोपाल मंत्र — गोविन्द, गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण की आराधना।
अर्थ
क्लीं — कृष्ण को, गोविन्द को, गोपीजनवल्लभ को: स्वाहा। आरंभ में दिव्य आकर्षण का बीज, अंत में पूर्ण आहुति; बीच में तीन नाम, जो ऐश्वर्य (कृष्ण) से पालन (गोविन्द) होते हुए आत्मीयता (गोपियों के अपने वल्लभ) तक उतरते हैं। 'स्वाहा' मंत्र को दिशा देता है — जो कहा गया, वह अर्पित भी हुआ।
कब जपें
परंपरा से गुरु से प्राप्त कर नित्य-जाप रूप में रखा जाता है — प्रातः साधना, जन्माष्टमी और कार्तिक मास; जिन्हें कृष्ण के ऐश्वर्य से अधिक उनकी माधुरी खींचती है, वे इसे हृदय के पास रखते हैं।
शब्द-दर-शब्द
- क्लींklīṁ
- दिव्य आकर्षण और प्रेम का बीज
- कृष्णायkṛṣṇāya
- कृष्ण के लिए
- गोविन्दायgovindāya
- गोविन्द के लिए
- गोपीजनवल्लभायgopījana-vallabhāya
- गोपीजनों के वल्लभ के लिए
- स्वाहाsvāhā
- पूर्ण समर्पण का पद
स्रोत: गोपाल तापनीय उपनिषद

