
विष्णु (नृसिंह) · कृष्ण
होली
होलिका की अग्नि, और फिर वह दिन जब सारा देश रंगों में खेलता है।
तिथि: फाल्गुन पूर्णिमा (दहन); प्रतिपदा (रंग)
सबसे सरल शब्दों में
रंगों का त्योहार! पहले होलिका की अग्नि बुराई जलाती है, और अगली सुबह सब गुलाल खेलते हैं — जब तक हर चेहरा इंद्रधनुष न बन जाए।
कथा और उद्देश्य
पूर्व संध्या प्रह्लाद की कथा है — वह बालक जिसकी भक्ति को अग्नि छू न सकी, जबकि उसे लेकर बैठी होलिका जल गई। बुराई स्वयं भस्म हुई; श्रद्धा अक्षत निकली।
अगली सुबह कृष्ण के व्रज की है — जहाँ रंग ने आयु, पद और मन-मुटाव का हर भेद मिटा दिया। बुरा न मानो, होली है।
ब्रज इस उत्सव को कई दिनों में फैला देता है — वृन्दावन की फूलों वाली होली, मंदिरों में स्वयं ठाकुर जी के साथ खेला गया रंग, और मथुरा में सप्ताह-भर।
क्या किया जाता है
होलिका दहन
सूर्यास्त बाद प्रदोष में सामूहिक अग्नि — परिक्रमा और नई फसल के दाने अर्पित।
रंग खेलना
प्रातः गुलाल और रंग; दोपहर स्नान, मिठाई और मिलने-मिलाने की।
गुझिया-ठंडाई
पर्व का स्वाद, पड़ोसियों से बाँटा हुआ।
श्रेष्ठ समय
दहन प्रदोष काल में, भद्रा टालकर; रंग अगली सुबह।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
बरसाना में कुछ दिन पहले लट्ठमार होली — राधा के गाँव की स्त्रियाँ कृष्ण के गाँव के पुरुषों पर लाठियाँ बरसाती हैं।
कुमाऊँ की बैठकी होली — पर्व शास्त्रीय संगीत की बैठकों के रूप में।
पारंपरिक रंग टेसू (पलाश) का जल, हल्दी और नीम थे — वनस्पति रंग, जिन्हें अनेक लोग कृत्रिम गुलाल से पहले वसंत की त्वचा-औषधि भी मानते हैं।
इस पर्व के मंत्र
टिप्पणी: दहन का समय भद्रा पर निर्भर है; कुछ क्षेत्र पूर्णिमा को ही रंग खेलते हैं।