कृष्ण
हरे कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare, Hare Rāma Hare Rāma, Rāma Rāma Hare Hare
सरल उच्चारण: Ha-re krish-na ha-re krish-na, krish-na krish-na ha-re ha-re, ha-re raa-ma ha-re raa-ma, raa-ma raa-ma ha-re ha-re
इस मंत्र के विषय में
महामंत्र — एक ही माला में सोलह नाम, जिसे कलिसंतरण उपनिषद में इस युग का जाप बताया गया है।
अर्थ
हरे, कृष्ण, राम — तीन नाम, सोलह बार, एक ही माला में गुँथे। 'हरे' हरि — दुःख हर लेने वाले — की पुकार है, अथवा गौड़ीय पाठ में 'हरा' — भगवद्-शक्ति, राधा — की; 'कृष्ण' सर्व-आकर्षक; 'राम' आनन्द के आगार। पूरे मंत्र में कहीं कोई माँग नहीं: यह शुद्ध संबोधन है — प्रियतम को नाम से पुकारते रहने की साधना, जब तक पुकार ही मिलन न बन जाए।
कब जपें
हर समय का कीर्तन — चलते, पकाते, प्रतीक्षा करते; समूह में गाया और अकेले माला पर गिना जाता है। जन्माष्टमी और एकादशी इसे सघन करती हैं; इसके लिए कोई दिन अनुचित नहीं।
शब्द-दर-शब्द
- हरेhare
- हे हरि — दुखहर्ता; गौड़ीय पाठ में हे हरा — राधा
- कृष्णkṛṣṇa
- सबको आकर्षित करने वाले
- रामrāma
- आनंद के स्रोत, रमण करने वाले
स्रोत: कलिसंतरण उपनिषद
टिप्पणी: कलिसंतरण उपनिषद दोनों अर्धों को उल्टे क्रम में देता है — पहले 'हरे राम', फिर 'हरे कृष्ण'। यहाँ दिया गया क्रम — पहले 'हरे कृष्ण' — चैतन्य (गौड़ीय) परंपरा का है, और अधिकांश कीर्तन इसी का अनुसरण करते हैं।

