
विष्णु (प्रह्लाद-रक्षक) और अग्नि · अग्नि के पास 30–45 मिनट
होलिका दहन विधि
फाल्गुन पूर्णिमा संध्या (21 मार्च 2027)
सबसे सरल शब्दों में
होली से पहले होलिका दहन, विधिवत: चिता, प्रह्लाद की कथा जिसने विष्णु पर भरोसा नहीं छोड़ा, और लपटों के चारों ओर बँटा भुना अनाज।
रंगों से पहले की रात एक अग्नि सबसे पुराना पाठ दोहराती है: होलिका का वरदान क्रूरता की सेवा में निष्फल हुआ, और विश्वास में बैठा बालक तनिक न जला। उसी अग्नि के चारों ओर घर अपने वर्ष की ज्वलनशील वस्तुएँ सौंपते हैं — द्वेष, भय, अहं की सूखी लकड़ियाँ।
सामग्री
0/4 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/5 पूर्णप्रज्वलन-पूर्व पूजन
सजी होलिका के प्रज्वलन-पूर्व: रोली-अक्षत, पुष्प, चुटकी गुलाल, नारियल, और मोली की (3 या 7) परिक्रमा-लपेट; मूल में जल।
प्रह्लाद-स्मरण
एक श्वास में कथा — बालक, चिता, विफल गोद और अविफल नाम — द्वादशाक्षर मंत्र सहित।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
Oṁ Namo Bhagavate Vāsudevāya
ॐ, भगवान वासुदेव को प्रणाम। वासुदेव अंतर्यामी कृष्ण हैं — 'वस्' धातु से: जिनमें सब प्राणी बसते हैं और जो सब प्राणियों में बसते हैं। बारह अक्षरों का यह मंत्र भागवत परंपरा का पूरा पथ एक पंक्ति में है — कोई माँग नहीं, एक संबोधन: भगवान के व्यक्तित्व की ओर मुड़ना और स्वयं को सौंप देना।
स्रोत: भागवत परंपरा (श्रीमद्भागवत पुराण)
मुहूर्त पर दहन
भद्रा-रहित प्रदोष मुहूर्त में अग्नि (पंचांग में अंकित)। लोटे से जलधारा देते हुए 3 या 7 परिक्रमा।
नवान्न-अर्पण
गेहूँ-चने की बालियाँ लौ में सेंककर बाँटी जाती हैं — ऋतु का प्रथम अन्न परिवार से पहले अग्नि को स्पर्श।
वर्ष की सूखी लकड़ी विसर्जन
मौन में एक द्वेष या भय नामकर अग्नि को सौंपें। दहन के बाद एक-दूसरे के माथे पर गुलाल — होली का प्रथम रंग; अगली भोर भस्म-टीका — रंग निर्मल आरंभ हों।
टिप्पणी: दहन दृढ़ परंपरा से भद्रा-रहित मुहूर्त में — नगर-मुहूर्त भिन्न; स्थानीय पंचांग देखें। 2027 में दहन 21 मार्च, रंग 22 मार्च (होली प्रविष्टि देखें)।