
महंकाली और ग्राम-देवियाँ
बोनालु
तेलंगाना की माता को कृतज्ञता — सिर पर पका अन्न, गली में ढोल।
तिथि: आषाढ़ मास के रविवार
सबसे सरल शब्दों में
तेलंगाना का महंकाली को धन्यवाद — माताएँ सिर पर सजे हुए बोनम (भोजन के घड़े) लेकर देवी के पास जाती हैं, आगे-आगे ढोल।
कथा और उद्देश्य
बोनालु आषाढ़ में महंकाली और मोहल्ले की देवियों — पोचम्मा, येल्लम्मा, मैसम्मा — को तेलंगाना का अर्पण है। स्त्रियाँ 'बोनम' — दूध-गुड़ में पका अन्न-कलश, ढक्कन पर जलता दीप — सिर पर धारण कर गलियों से माता के मंदिर तक जाती हैं।
शब्द है 'भोजनालु' — भोजन — देवी को परिवार की ज्येष्ठ माता मानकर पहले परोसा जाता है। उनके भाई पोतुराजु शोभायात्राओं के आगे नृत्य करते हैं; उज्जैनी महंकाली में 'रंगम' भविष्य कहती है। यह 1813 की महामारी से चला आता संकल्प है — जुड़वाँ नगरों की रक्षा माता से माँगी गई थी, और मिली।
क्या किया जाता है
बोनम
घर में पका अन्न-कलश, नीम और हल्दी-कुमकुम से सज्जित, जलते दीप सहित मंदिर तक।
तोट्टेला
संकल्प के काग़ज़-मंडप; देवी को साड़ी-चूड़ी।
देवी जाप
ॐ दुं दुर्गायै नमः या 'या देवी' — वही माता, तेलंगाना के नामों से।
श्रेष्ठ समय
बोनम रविवार प्रातः मंदिर जाते हैं; ढोल और पोतुराजु दिन-भर आगे-आगे।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
पर्व मंदिर-क्रम से चलता है — पहले गोलकोंडा, फिर उज्जैनी महंकाली (सिकंदराबाद), फिर लाल दरवाज़ा (पुराना शहर)।
बोनालु तेलंगाना का राजकीय उत्सव है।
उज्जैनी महंकाली का 'रंगम' लश्कर बोनालु के अगले प्रातः होता है — भाव-समाधि में एक स्त्री, गीले मिट्टी के घड़े पर खड़ी होकर, वर्ष का भविष्य कहती है।
इस पर्व के मंत्र
टिप्पणी: बोनालु महीने-भर का रविवार-चक्र है; प्रत्येक मंदिर का मुख्य दिन वर्ष-दर-वर्ष घोषित होता है। 2027 का आरंभ गोलकोंडा परंपरा से है — स्थानीय पुष्टि करें।