
विष्णु · लक्ष्मी
अक्षय तृतीया
अक्षय तिथि — आज जो आरंभ या दान होता है, परंपरा कहती है, क्षय नहीं होता।
तिथि: वैशाख शुक्ल तृतीया
सबसे सरल शब्दों में
वह दिन जिसका पुण्य कभी घटता नहीं — 'अक्षय' का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। लोग नए काम शुरू करते हैं, दान देते हैं, और लक्ष्मी जी का स्वागत करते हैं।
कथा और उद्देश्य
अक्षय अर्थात् जिसका क्षय न हो। इसी तिथि से त्रेता युग का आरंभ माना जाता है, परशुराम का जन्म हुआ, और सुदामा की मुट्ठी-भर पोहा कृष्ण के हाथों अक्षय संपदा बनी — यह देने से बढ़ने का दिन है।
मान्यता है कि इसी दिन व्यास ने महाभारत बोलना और गणेश ने लिखना आरंभ किया — अक्षय धन के जोड़ का अक्षय शब्द। स्वर्ण-क्रय की आधुनिक होड़ इस दिन के वास्तविक अर्थशास्त्र पर बाद की परत है: आज जो दिया जाता है वही बहुगुणित होता है; अक्षय फल का शास्त्रीय साधन सदा दान था।
क्या किया जाता है
दान
जल, अन्न, पंखे — ग्रीष्म में आवश्यकता वालों को दान: यही इस दिन का सच्चा 'क्रय' है।
लक्ष्मी-विष्णु पूजा
स्थायी, धर्मपूर्वक समृद्धि हेतु पूजन।
शुभारंभ
नए कार्य, बही के प्रथम लेख, और अक्षय के प्रतीक रूप में स्वर्ण।
श्रेष्ठ समय
पूरी तिथि स्वयं शुभ मानी गई है — पृथक् मुहूर्त की आवश्यकता नहीं।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के बाद प्रायः इसी के आसपास खुलते हैं।
वृंदावन के बांके बिहारी के चरण-दर्शन वर्ष में केवल इसी दिन होते हैं।
पुरी में रथयात्रा के रथों का निर्माण हर वर्ष इसी दिन आरम्भ होता है।
इस पर्व के मंत्र
टिप्पणी: कुछ 2026 पंचांग 20 अप्रैल लिखते हैं, क्योंकि तृतीया उस दिन सूर्योदय के बाद तक रहती है।