
गणेश, लक्ष्मी, वास्तु-पुरुष · 60–90 मिनट
गृह प्रवेश
नए/नवीनीकृत घर में प्रवेश, चुने मुहूर्त पर
सबसे सरल शब्दों में
नए घर में शुभ प्रवेश — पहले कलश, दायाँ पैर पहले, दूध उफनने तक (यहाँ मिठास छलके), और गणेश-लक्ष्मी का स्वागत।
मकान वैसे ही घर बनता है जैसे मूर्ति देवता — आमंत्रण से। सरल गृह प्रवेश: आम्रपत्र-कलश सजी देहरी पर दाहिना चरण, सर्वप्रथम गणेश, उफनने तक खौलाया दूध, और पहली रात सचमुच वहीं शयन। वास्तु-शांति हवन, जहाँ परिवार चाहे, पुरोहित का विधान है; यह घर का अपना है।
सामग्री
0/4 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/6 पूर्णदेहरी-सज्जा
तोरण, चौखट पर स्वस्तिक, सम्मुख रंगोली, द्वार के दाहिने कलश।
दाहिना चरण प्रथम
मुहूर्त पर सपरिवार प्रवेश — देहरी पर दाहिना चरण, कलश गृहिणी/ज्येष्ठ के हाथ, गणेश-नाम सस्वर।
ॐ गं गणपतये नमः
Oṁ Gaṁ Gaṇapataye Namaḥ
ॐ — गं — गणों के स्वामी गणपति को प्रणाम। गण शिव के अनुचर-समूह हैं; भक्त-टीकाकार इस शब्द को संसार की हर व्यवस्थित शक्ति तक फैलाते हैं — और गणपति वह मेधा हैं जो उन्हें व्यवस्थित करती है। यह मंत्र लघु रूप में एक प्रार्थना है: जो मार्ग रोकता है वह हट जाए, और जो बिखरा है वह क्रम में आ जाए।
स्रोत: गणपति अथर्वशीर्ष (गणपति उपनिषद)
गणेश-लक्ष्मी स्थापना
पूजा-कोण (वास्तु से ईशान) में: चित्र-स्थापना, दीप-धूप — फ़र्नीचर से पहले विघ्नहर्ता और श्री की प्रतिष्ठा।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
Vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi-samaprabha, nirvighnaṁ kuru me deva sarva-kāryeṣu sarvadā
हे वक्रतुण्ड, विशाल काया वाले, करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी देव — मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न कीजिए। श्लोक 'निर्विघ्न' माँगता है: यह नहीं कि कार्य हमारे लिए कर दिया जाए, बल्कि यह कि पथ इतना निष्कंटक हो कि हमारा अपना पुरुषार्थ फल सके। 'सर्वदा, सर्वकार्येषु' इसे वह एक प्रार्थना बना देता है जो जीवन के हर प्रयास को ढँक लेती है।
स्रोत: पारंपरिक गणेश ध्यान-श्लोक, अधिकांश गणेश-पूजाओं के आरंभ में पढ़ा जाता है; कोई एक शास्त्रीय स्रोत स्थापित नहीं है।
दूध का उफान
नई रसोई में दूध पूर्व दिशा की ओर उफनने तक — चूल्हे का प्रथम कर्म छलकती समृद्धि; उसी से मीठे चावल/खीर।
लक्ष्मी-भ्रमण
दीप सहित हर कक्ष में — प्रत्येक कोण को प्रकाश-दर्शन; साथ-साथ मृदु श्रीं मंत्र।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ
ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।
स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र
भोज और शयन
खीर अर्पित, फिर वितरण — अतिथि, सहायक, पड़ोस के बच्चे प्रथम; और उस रात परिवार वहीं सोए। बड़े कहते हैं — जिस प्रवेश में शयन नहीं, वह भेंट भर है।
टिप्पणी: मुहूर्त कुल-पंचांग से (अक्षय तृतीया और देवउठनी-पश्चात प्रिय; चातुर्मास परंपरा से वर्जित)। किराए का घर भी यही विधान सहर्ष लेता है — घर काग़ज़ नहीं देखता।