वीरभद्रासन
वीरभद्रासन २ — योद्धा मुद्रा
वीरभद्र = शिव के महावीर गण — योद्धा की स्थिति
चौड़ा, नीचा और अडिग — बाँहें खिंचे क्षितिज-सी फैली हुईं।
सबसे सरल शब्दों में
टाँगें खूब फैलाकर खड़े हो जाओ, अगला घुटना ऐसे मोड़ो जैसे घोड़े पर बैठे हो, और दोनों बाँहें हवाई-जहाज़ के पंखों-सी फैला दो। अगले हाथ के ऊपर से देखो और सुपरहीरो पहरेदार-से डटे रहो।
यह क्या है
शिव के संकल्प से जन्मे वीरभद्र के नाम पर यह स्थिति टाँगें चौड़ी रोपती है, अगला घुटना ठीक टखने के ऊपर मोड़ती है, और बाँहों को एक लम्बी रेखा में तानती है — दृष्टि अगले हाथ के पार टिकी। कुछ हिलता नहीं, फिर भी सब कार्यरत है — जाँघें चुपचाप तपतीं, छाती खुली, साँस लम्बी। यह स्थिरता रूप में साधा गया बल है: आसन 'टिके रहना' सिखाता है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
घुटना टखने की सीध में रहे — उससे आगे या भीतर कभी नहीं। घुटने की चोट में कदम छोटा करें; उच्च रक्तचाप में ठहराव छोटा और बाँहें नीची; गर्दन-दर्द में दृष्टि सामने रखें, हाथ के पार नहीं।
आसन में कैसे आएँ
पैर खूब चौड़े रखें; दायाँ पंजा 90° बाहर, बायाँ थोड़ा भीतर।
बाँहें कंधे की ऊँचाई तक, हथेलियाँ नीचे, एक रेखा में उठाएँ।
दायाँ घुटना तब तक मोड़ें कि वह टखने के ठीक ऊपर हो — न आगे, न भीतर की ओर झुका।
धड़ दोनों टाँगों के बीच सीधा रहे; कंधे कोमल, दृष्टि दाईं उँगलियों के पार।
सम साँस के साथ ठहरें, फिर सीधे होकर दिशा बदलें।
श्वास
लम्बी, सम उज्जायी-शैली साँसें टाँगों को इच्छाशक्ति से अधिक देर थामे रखती हैं।
किसलिए किया जाता है
टाँगों-कूल्हों का बल, दमख़म, खुली छाती — और जमे हुए साहस की सजीव अनुभूति।