विपरीत करणी
विपरीत = उलटा, करणी = क्रिया — कोमल व्युत्क्रम
लेट जाइए, टाँगें दीवार पर टिका दीजिए, और दस मिनट गुरुत्व को अपने पक्ष में काम करने दीजिए।
सबसे सरल शब्दों में
दीवार के पास पीठ के बल लेटो और टाँगें उस पर सीधी चढ़ा दो — तुम 'L' बन गए। बाँहें ढीली, आँखें बंद। थकी टाँगें अपनी थकान उँडेल देती हैं — तैरने जैसा लगता है।
यह क्या है
हठ ग्रन्थ विपरीत करणी की बात लगभग फुसफुसाहट में करते हैं — देह के प्रवाह को उलट देने वाली 'विपरीत क्रिया' — और यह सहारा-युक्त रूप उसका सबसे कोमल द्वार है: कूल्हे दीवार के पास, टाँगें उस पर टिकीं, बाँहें खुलीं, सब कुछ धरती के हवाले। थकी टाँगें रीत जाती हैं, देह इस आकृति को विश्राम की भाषा में पढ़ती है, और नींद से रूठी शामें मिनटों में कोमल पड़ जाती हैं। यह नाटकीय व्युत्क्रमों का सच्चा अंश देता है — उनके जोखिम के लगभग बिना — इसीलिए यह साइट इसे सिखाती है, और शीर्षासन-सर्वांगासन जीवित गुरुओं के लिए छोड़ती है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
यह कोमल व्युत्क्रम भी ग्लूकोमा या गम्भीर नेत्र-दाब, अनियंत्रित रक्तचाप में नहीं; मासिक धर्म में आपकी परम्परा या सुविधा कहे तो छोड़ दें; गर्भावस्था के अंतिम चरण में बाईं करवट ही श्रेयस्कर। पैरों में झुनझुनी का अर्थ बस इतना — घुटने मोड़कर उतर आएँ।
आसन में कैसे आएँ
दीवार से सटकर करवट में बैठें, कूल्हा उसे छूता हुआ।
पीछे लेटते हुए टाँगें दीवार पर घुमा लें — कूल्हों को सुविधानुसार पास सरकाएँ।
कूल्हों तले मुड़ा कम्बल सुखद है; बाँहें खुलीं, हथेलियाँ ऊपर।
आँखें बंद कर ठहरें — साँस सहज, या उस पर सवार सोऽहम्।
बाहर आने को घुटने मोड़ें, दाईं करवट लें, और उठने से पहले क्षण भर विश्राम करें।
श्वास
कुछ करना नहीं — आकृति स्वयं साँस धीमी कर देती है; बस होते हुए देखें।
किसलिए किया जाता है
थकी टाँगों की निकासी, शयन-पूर्व विश्राम, व्युत्क्रम का सुरक्षित स्वाद, और वह आराम जो सच में लौटाता है।