वज्रासन
वज्र = इन्द्र का अस्त्र — हीरे-सा दृढ़ आसन
एड़ियों पर बैठिए — स्थिरता की वह बैठक जिसमें परम्परा से भोजन के बाद बैठा जाता है।
सबसे सरल शब्दों में
घुटनों के बल बैठकर एड़ियों पर टिक जाओ, जैसे अपने ही पैरों की छोटी कुर्सी पर बैठे हो। पीठ सीधी, हाथ जाँघों पर — बहुत से लोग पूजा या भोजन में ऐसे ही बैठते हैं।
यह क्या है
वज्रासन में घुटनों के बल बैठकर एड़ियों पर टिकते हैं, और रीढ़ उस दृढ़ आधार से सीधी उठती है — "वज्र" इसी अडिग स्थिरता का नाम है। यही एक शास्त्रीय आसन है जो परम्परा में भोजन के तुरन्त बाद भी किया जाता है, और कपालभाति तथा जप के लिए प्रिय बैठक है। टखनों-घुटनों को इससे मित्रता में थोड़ा समय लगता है; एड़ियों और कूल्हों के बीच गद्दी रखने से शुरुआत कोमल हो जाती है।
अभ्यास से पहले — स्वास्थ्य सर्वोपरि
घुटने या टखने की चोट में न करें; घुटने में तेज़ दर्द रुकने का संकेत है, सहने की चीज़ नहीं। पैर सुन्न हों तो बाहर आकर टाँगें सीधी करें।
आसन में कैसे आएँ
घुटने मिलाकर बैठें, पीछे अँगूठे स्पर्श करते हुए, एड़ियाँ थोड़ी अलग।
एड़ियों के पालने में बैठ जाएँ।
हथेलियाँ जाँघों पर रखें; रीढ़ ऊपर बढ़ाएँ।
टखने या घुटने कष्ट दें तो नीचे या एड़ियों-कूल्हों के बीच गद्दी रखें।
आगे झुककर हाथों का सहारा लें और टाँगें सीधी कर बाहर आएँ।
श्वास
सहज साँस; भोजन के बाद अत्यंत कोमल और बिना प्रयास।
किसलिए किया जाता है
जप-प्राणायाम की दृढ़ बैठक; परम्परा में पाचन हेतु भोजनोपरान्त बैठा जाता है।