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Dharamkira
पूजा विधि
नारियल रखा कलश, श्वेत-लाल पुष्पमालाओं से लिपटा, दोनों ओर केले के पत्ते।
पूजा के लिए सजा कलश, कर्नाटकMikeLynch, 2011

तुलसी और शालिग्राम (विष्णु) · 60 मिनट, संध्या

तुलसी विवाह

कार्तिक शुक्ल द्वादशी (21 नवंबर 2026; 11 नवंबर 2027)

सबसे सरल शब्दों में

तुलसी का विष्णु से विवाह — गमले के चारों ओर नन्हा मंडप, वर रूप में शालिग्राम या कृष्ण मूर्ति, और मौसम के पहले विवाह-गीत।

विष्णु के जागरण के अगले दिन घर में सचमुच का विवाह रचता है — वधू: आँगन की तुलसी; वर: शालिग्राम या कृष्ण-विग्रह; बाराती: सब। इससे विवाह-ऋतु खुलती है — पंचांग का कोमलतम तत्त्वज्ञान: स्वयं भक्ति का भगवान से पाणिग्रहण।

यह पूजा करें

5 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/7 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/5 पूर्ण
  1. मंडप-स्थापना

    तुलसी पर गन्ने का मंडप, चारों ओर रंगोली, कोनों पर दीप — आँगन विवाह-भूमि बन जाता है।

  2. वर-वधू शृंगार

    तुलसी को चुनरी-चूड़ी, रीति से बिंदी-मंगलसूत्र, पत्रों को हल्दी-स्पर्श; शालिग्राम/कृष्ण नववस्त्र में उनके सम्मुख।

    ॐ तुलस्यै नमः

    Oṁ Tulasyai Namaḥ

    ॐ, तुलसी को प्रणाम। नाम का भाव लिया जाता है — 'जिसकी तुलना नहीं': वह देवी जिन्होंने आँगन के पौधे का रूप चुना — इतनी पावन कि एक पत्र से विष्णु-पूजा पूर्ण होती है। उनका मंत्र सबसे विनम्र दैनिक कृत्यों का संगी है — और यही इसका अर्थ है: परमात्मा सेवा स्वीकार करने को सहमत हैं।

    स्रोत: पारंपरिक नाम-मंत्र

  3. गठबंधन

    मोली वर-आसन को तुलसी-तने से जोड़ती है — विवाह की गाँठ — विष्णु-मंत्र गूँजता रहे।

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    Oṁ Namo Bhagavate Vāsudevāya

    ॐ, भगवान वासुदेव को प्रणाम। वासुदेव अंतर्यामी कृष्ण हैं — 'वस्' धातु से: जिनमें सब प्राणी बसते हैं और जो सब प्राणियों में बसते हैं। बारह अक्षरों का यह मंत्र भागवत परंपरा का पूरा पथ एक पंक्ति में है — कोई माँग नहीं, एक संबोधन: भगवान के व्यक्तित्व की ओर मुड़ना और स्वयं को सौंप देना।

    स्रोत: भागवत परंपरा (श्रीमद्भागवत पुराण)

  4. गमले की परिक्रमा

    परिवार वर को तुलसी की परिक्रमा कराता है (या युगल की परिक्रमा) — परंपरा से सात फेरे, विवाह-सम अक्षत-वर्षा।

  5. आरती-भोज, बिना विदाई की विदाई

    ऋतु-नैवेद्य अर्पण, फिर विवाह-आरती; वही नैवेद्य विवाह-भोज। यहाँ विदाई नहीं — वधू घर ही रहती हैं; यही तो मर्म है।

टिप्पणी: कुछ अंचल देवउठनी को ही विवाह रचाते हैं, कुछ द्वादशी को — दोनों कैलेंडर में हैं। तुलसी का कन्यादान करने वाले को कन्यादान-पुण्य कहा गया है; जिन दंपतियों की कन्या नहीं, वे इस विधान को विशेष भाव से करते हैं।

तुलसी विवाहदेवउठनी एकादशी