
तुलसी · विष्णु (शालिग्राम)
तुलसी विवाह
तुलसी का शालिग्राम से विवाह — और विवाह-ऋतु का शुभारंभ।
तिथि: कार्तिक शुक्ल द्वादशी (देवउठनी एकादशी के उपरांत)
सबसे सरल शब्दों में
आँगन की तुलसी का विवाह होता है — भगवान विष्णु से! एक नन्ही, मीठी शादी, जिसके साथ सबके विवाहों का मौसम भी खुल जाता है।
कथा और उद्देश्य
देवउठनी एकादशी को चार मास की योगनिद्रा से विष्णु जागते हैं, और आँगन मंडप बन जाता है: पूज्यतम तुलसी का शालिग्राम से पूर्ण विधि से विवाह होता है। इसी से चातुर्मास का विराम हटता है और विवाह पुनः आरंभ होते हैं।
इसके नीचे वृंदा की कथा है — जिनके सतीत्व ने उनके पति को अजेय कर दिया, जब तक स्वयं विष्णु ने वह व्रत नहीं तोड़ा; उन्हीं के वरदान और पश्चाताप से वृंदा तुलसी हुईं। हर कार्तिक में शालिग्राम से उनका विवाह परंपरा का वार्षिक प्रायश्चित है।
क्या किया जाता है
मंडप-शृंगार
गन्ने के मंडप में चुनरी ओढ़े तुलसी का वधू-शृंगार।
विवाह विधि
कन्यादान, मंगलसूत्र, फेरे — पूर्ण विवाह विधि।
श्रेष्ठ समय
विवाह प्रायः प्रदोष-संध्या में।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
तुलसी विवाह कराने वाले घर को कन्यादान का पुण्य कहा गया है।
शालिग्राम वर बनकर छोटी-सी बारात में पधारते हैं — प्रायः परिवार के पुरुष उन्हें मंदिर से आँगन तक लाते हैं।
अनेक घर यह विवाह देवउठनी एकादशी को ही, या कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन करते हैं — तिथि कुल-परंपरा से तय होती है।