
लक्ष्मी · गणेश · कुबेर · 45–60 मिनट
दीपावली लक्ष्मी पूजन
दीपावली रात्रि (8 नवंबर 2026), प्रदोष काल
सबसे सरल शब्दों में
दिवाली की संध्या का मुख्य कार्य: स्वच्छ घर, रंगोली, दीयों की कतारें, और फिर कमल-मिठाई संग पूरे परिवार का माँ लक्ष्मी को आमंत्रण।
वर्ष की सबसे अंधेरी रात घर स्वयं दीप बनता है — स्वच्छ, प्रकाशित, लक्ष्मी हेतु खुला। सदा की भाँति प्रथम पूज्य गणेश; वर्ष की अतिथि लक्ष्मी का स्वागत; और कार्य के बही-उपकरणों पर भी उनकी दृष्टि।
विधि घंटियों से नहीं, झाड़ू और रंगोली से आरंभ होती है: परंपरा कहती है, लक्ष्मी प्रदोष में उन घरों को खोजती चलती हैं जो स्वच्छ, प्रकाशित और कलह-रहित हों — नीचे की पूजा बस यह सुनिश्चित करती है कि वे आपके घर को पहचान लें।
सामग्री
0/9 एकत्रविधि, चरण-दर-चरण
0/10 पूर्णगृह-सज्जा
दिन में स्वच्छता; द्वार पर रंगोली; पूजा से पूर्व द्वार-दीप — लक्ष्मी प्रकाश और सुव्यवस्था की ओर आती हैं।
चौकी-कलश स्थापना
लाल वस्त्र; गणेश लक्ष्मी के बाएँ — परंपरा कहती है, माँ पुत्र के दाहिने बैठती हैं; आम्रपत्र-नारियल सहित कलश; लक्ष्मी के सम्मुख सिक्के।
आचमन-संकल्प
तीन आचमन; फिर सपरिवार संकल्प — गृह, कल्याण और आगामी वर्ष की धर्मपूर्वक समृद्धि।
प्रथम गणेश पूजन
सर्वप्रथम विघ्नहर्ता को चंदन-अक्षत-पुष्प और संक्षिप्त जाप।
ॐ गं गणपतये नमः
Oṁ Gaṁ Gaṇapataye Namaḥ
ॐ — गं — गणों के स्वामी गणपति को प्रणाम। गण शिव के अनुचर-समूह हैं; भक्त-टीकाकार इस शब्द को संसार की हर व्यवस्थित शक्ति तक फैलाते हैं — और गणपति वह मेधा हैं जो उन्हें व्यवस्थित करती है। यह मंत्र लघु रूप में एक प्रार्थना है: जो मार्ग रोकता है वह हट जाए, और जो बिखरा है वह क्रम में आ जाए।
स्रोत: गणपति अथर्वशीर्ष (गणपति उपनिषद)
लक्ष्मी आवाहन-षोडशोपचार
'नमस्तेऽस्तु महामाये' से लक्ष्मी का आवाहन (कुल में श्रीसूक्त पढ़ा जाता हो तो वह भी) — फिर षोडशोपचार: पंचामृत-जल स्पर्श स्नान, वस्त्र, चंदन, हल्दी-कुमकुम, अक्षत, कमल/गेंदा, धूप, दीप और खील-बताशे व फल का नैवेद्य।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
Namas te'stu mahāmāye śrīpīṭhe sura-pūjite, śaṅkha-cakra-gadā-haste mahālakṣmi namo'stu te
हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित; हे शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी — आपको नमस्कार। पहले 'महामाया', आयुध बाद में: अष्टक का आरंभ यह स्वीकार कर होता है कि ढँकने-खोलने की उनकी शक्ति उनके हाथों में धरी हर वस्तु से पहले है। क्रम का संकेत यह है — धन भी उन्हीं की एक और अभिव्यक्ति है।
स्रोत: महालक्ष्म्यष्टकम् १ (पद्म पुराण परंपरा)
श्रीं जाप — रात्रि का हृदय
महालक्ष्मी मंत्र की पूर्ण माला, बिना जल्दी — पूजा का स्थिर केंद्र।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
Oṁ Śrīṁ Mahālakṣmyai Namaḥ
ॐ — श्रीं — महालक्ष्मी को प्रणाम। 'श्रीं' बीज रूप में सिमटी हुई 'श्री' है, जो जाप से बोई जाती है। मंत्र धन की देवी से उपहार नहीं, उपस्थिति माँगता है — परंपरा कहती है, जहाँ लक्ष्मी का वास है, वहाँ पर्याप्तता स्वयं चली आती है।
स्रोत: देवी-उपासना परंपरा का पारंपरिक बीज-मंत्र
चोपड़ा-उपकरण पूजन
बही-खाते या कार्य-उपकरणों पर कुमकुम-स्वस्तिक; प्रार्थना कि वर्ष का कार्य सत्यनिष्ठ और मंगलमय रहे।
ॐ कुबेराय नमः
Oṁ Kuberāya Namaḥ
ॐ, देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को प्रणाम। स्वामी नहीं — कोषाध्यक्ष: इस दर्शन में धन धरोहर है, उत्तर द्वार पर रक्षित, वहीं खुलता जहाँ सार्थक हो। यह मंत्र धन से कोषाध्यक्ष जैसा ही सम्बन्ध माँगता है — सँभाल, बिना जकड़ के।
स्रोत: पारंपरिक नाम-मंत्र
आरती
सपरिवार लक्ष्मी आरती, घंटी-नाद सहित — प्रायः 'ॐ जय लक्ष्मी माता'।
दीपदान
हर द्वार, खिड़की और अंधेरे कोने तक दीप — पूजा पूरे घर में चलती है।
प्रसाद-खुला द्वार
खील-बताशे, मिठाई वितरण; परंपरा से मुख्य द्वार कुछ काल खुला — स्वागत जलता रहे।
टिप्पणी: मुख्य पूजा हेतु स्थिर लग्न-युक्त प्रदोष श्रेष्ठ; नगर-मुहूर्त भिन्न — स्थानीय पंचांग देखें। व्यापारी परंपराएँ चोपड़ा/शारदा पूजन जोड़ती हैं।