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Dharamkira
पूजा विधि
तेजोमय प्रभामंडल में मुकुटधारी सूर्यदेव, सात अश्वों के रथ पर आकाश में — रवि वर्मा प्रेस का प्रारंभिक लिथोग्राफ।
सूर्य नारायणरवि वर्मा प्रेस, early 1900s

यम-यमुना · 20 मिनट

भाई दूज — यमुना का तिलक

कार्तिक शुक्ल द्वितीया (11 नवंबर 2026; 31 अक्तूबर 2027)

सबसे सरल शब्दों में

भाई के माथे पर बहन का तिलक, यमुना की रीत से — उन्होंने भाई यम को भोजन कराया, और यम ने ऐसे सम्मानित हर भाई को दीर्घायु का वचन दिया।

इसी द्वितीया को यमुना ने भाई यम को अपने घर भोजन कराया, और मृत्यु के स्वामी ने वचन दिया: आज बहन के हाथों सम्मानित भाई को अकाल का भय नहीं। दीपावली दीपों से नहीं, इसी से पूर्ण होती है — सजी थाली पर फिर बँधा सहोदर-सूत्र।

यह पूजा करें

4 चरण, एक-एक करके — दीये, मंत्रों और घंटी के साथ, इसी स्क्रीन पर।

सामग्री

0/3 एकत्र

विधि, चरण-दर-चरण

0/4 पूर्ण
  1. बहन की देहरी

    रीति से आज भाई बहन के घर आता है — राखी की दिशा से उलट; यह आगमन ही विधान का पूर्वार्ध है।

  2. तिलक-आरती

    रोली-अक्षत तिलक, हथेली में गोला, थाली से आरती — हर घर में यमुना की ही मुद्राएँ।

    मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं गरुडध्वजः । मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनं हरिः ॥

    Maṅgalaṁ bhagavān viṣṇur maṅgalaṁ garuḍa-dhvajaḥ, maṅgalaṁ puṇḍarīkākṣo maṅgalāyatanaṁ hariḥ

    भगवान विष्णु मंगलमय हैं; गरुड़ध्वज मंगलमय हैं; पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) मंगलमय हैं; हरि स्वयं मंगल के धाम हैं। श्लोक दोहराव से आशीर्वाद देता है — 'मङ्गलं' चार बार ऐसे गिरता है जैसे द्वार पर पुष्प। यह नहीं माँगता कि कुछ बिगड़े नहीं — यह घोषित करता है कि किसकी उपस्थिति सब सँवार देती है।

    स्रोत: पारंपरिक मंगल-श्लोक (पूजा पद्धति)

  3. भोजन

    पहला कौर — मिठाई — बहन अपने हाथ से; भोजन इसी दिन के भाव से पका। कथा कहती है — यम का वर इसी थाली पर चलता है।

  4. उपहार-प्रणाम

    भाई की ओर से बहन को भेंट; छोटे का बड़े को प्रणाम; समापन-प्रार्थना साथ में।

    त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥

    Tvam eva mātā ca pitā tvam eva, tvam eva bandhuś ca sakhā tvam eva, tvam eva vidyā draviṇaṁ tvam eva, tvam eva sarvaṁ mama deva-deva

    तुम ही मेरी माता हो और पिता भी तुम ही; तुम ही बंधु और सखा भी तुम ही; तुम ही विद्या और धन भी तुम ही; हे देवों के देव, तुम ही मेरे सर्वस्व हो। श्लोक सूची पूरी करके कार्य करता है: जीवन जिन-जिन आधारों पर टिकता है — माता-पिता, बंधु, सखा, विद्या, धन — एक-एक कर सौंपे जाते हैं, जब तक 'मम सर्वं' कविता नहीं, ब्योरा न बन जाए। पूजा का समापन यही करता है — क्योंकि पूजा यहीं पहुँचती है।

    स्रोत: पाण्डव गीता (पारंपरिक प्रार्थना संग्रह)

टिप्पणी: दूरी हो तो तिलक डाक से और भोजन वीडियो-कॉल पर — यमुना बुरा नहीं मानेंगी। बंगाल यही विधान 'भाई फोंटा' रूप में धान-दूर्वा आशीर्वाद सहित रखता है।

भाई दूज