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Dharamkira
त्योहार पंचांग
मोर पर विराजमान षण्मुख कार्तिकेय (मुरुगन), साथ में वल्ली और देवसेना, पीछे फैला मोरपंख — राजा रवि वर्मा का चित्र।
मुरुगन (कार्तिकेय) अपनी पत्नियों सहितराजा रवि वर्मा / रवि वर्मा प्रेस, c. 1900s

मुरुगन (स्कंद, कार्तिकेय)

स्कंद षष्ठी (सूरसंहारम्)

छह दिन का व्रत, एक वेल-प्रहार — और असुर देव का ही मयूर बन जाता है।

तमिलनाडु और विश्व-भर के मुरुगन भक्त
सूरसंहारम् 2026: रविवार, 15 नवंबर 2026सूरसंहारम् 2027: गुरुवार, 4 नवंबर 2027

तिथि: कार्तिक शुक्ल षष्ठी — और उसमें पूर्ण होते छह दिन

सबसे सरल शब्दों में

मुरुगन का छह-दिवसीय युद्ध-पर्व — समापन सूरसंहारम् से, जब पराजित असुर ही उनका मोर और मुर्गा बन जाता है। शत्रु भी बदले जा सकते हैं।

कथा और उद्देश्य

सूरपद्मन के अत्याचार में देवता बंदी थे; शिव-तेज से जन्मे षण्मुख स्कंद ने छह दिन देवसेना का नेतृत्व किया। तिरुचेंदूर के तट पर उन्होंने वेल छोड़ा — और विदीर्ण असुर ने आत्मसमर्पण किया: एक अर्ध वह मयूर बना जिस पर मुरुगन विराजते हैं, दूसरा उनकी ध्वजा का कुक्कुट। शत्रु का नाश नहीं — वाहन में रूपांतरण।

भक्त छह दिन का कंद षष्ठी व्रतम् रखते हैं — कई केवल तरल या एकाहार पर — 'कंद षष्ठी कवचम्' का पाठ करते हुए। छठी संध्या तिरुचेंदूर सागर-तट पर लाखों के सम्मुख सूरसंहारम् का पुनरभिनय होता है — वर्ष की महान मुरुगन-रात्रि।

क्या किया जाता है

षष्ठी व्रतम्

यथाशक्ति छह-दिवसीय व्रत; सूरसंहारम् के बाद समापन।

कवचम् पाठ

नित्य कंद षष्ठी कवचम् — मुरुगन का श्लोक-कवच।

वेल पूजा

दूध-विभूति से वेल-पूजन; 'वेट्रिवेल् मुरुगनुक्कु अरोहरा!'

षष्ठी जाप

छहों दिन ॐ शरवणभवाय नमः।

श्रेष्ठ समय

नित्य पूजा प्रातः-सायं; सूरसंहारम् छठे दिन सूर्यास्त पर।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • यही षष्ठी छठ की तिथि है — दक्षिण में स्कंद, उत्तर में सूर्य; पंचांग एक।

  • अगले दिन तिरुचेंदूर में मुरुगन-देवयानी विवाह — विजय की पूर्णता कृपा से।

  • छहों पड़ई वीडु इस सप्ताह उमड़ते हैं — पलनी सर्वाधिक।

इस पर्व के मंत्र