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Dharamkira
त्योहार पंचांग
चित्र: चाँदनी में गंगा-तट पर घुटनों के बल बैठी एक स्त्री छोटा दीप जल में छोड़ती है; पीछे विश्राम करती गाय।
गंगा में दीप प्रवाहित करती स्त्रीविलियम सिम्पसन, 19th century

पितृगण

पितृ पक्ष

पूर्वजों के श्राद्ध और स्मरण का पखवाड़ा।

आरंभ (पूर्णिमा श्राद्ध; कुछ 27 से गिनते हैं): शनिवार, 26 सितंबर 2026सर्वपितृ अमावस्या: शनिवार, 10 अक्टूबर 2026आरंभ 2027 (पूर्णिमा श्राद्ध): बुधवार, 15 सितंबर 2027सर्वपितृ अमावस्या 2027: बुधवार, 29 सितंबर 2027

तिथि: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (उत्तर) · भाद्रपद पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या (पश्चिम-दक्षिण)रात वही है

आप कौन-सा पंचांग मानते हैं?

शुक्ल पक्ष का नाम हर जगह एक ही है। कृष्ण पक्ष उत्तर में एक मास का होता है और महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण में उससे पिछले मास का — रात वही, नाम दो, और दोनों सही। चुनाव केवल इसी उपकरण पर रहता है।

सबसे सरल शब्दों में

अपने पुरखों को याद करने के दो शांत सप्ताह — जल और भोजन अर्पित कर, हम उन सबको धन्यवाद कहते हैं जो हमसे पहले आए।

कथा और उद्देश्य

देवी की नवरात्रि से पहले परंपरा पंद्रह दिन उस ऋण के लिए रखती है जिससे कोई मुक्त नहीं — जिन्होंने हमें देह और नाम दिए। जल-तिल से तर्पण; उनके नाम पर ब्राह्मण, निर्धन, गौ और काक — पितरों के दूत — को अन्न।

पखवाड़े के पीछे कर्ण की कथा है: परलोक में उन्हें सोना परोसा गया, क्योंकि जीवन-भर उन्होंने सोना ही दिया था, अन्न कभी नहीं — पंद्रह दिन के लिए धरती लौटाकर उनसे भूखों को अन्न कराया गया। इसीलिए अन्नदान ही इस पक्ष की सच्ची मुद्रा है।

क्या किया जाता है

तर्पण

दक्षिणाभिमुख होकर तिल-जल से नित्य तर्पण, वंश-स्मरण सहित।

तिथि-श्राद्ध

देहावसान-तिथि पर श्राद्ध; सर्वपितृ अमावस्या सबके लिए।

अन्नदान

पितरों के नाम भोजन कराना — पक्ष का मुख्य दान।

श्रेष्ठ समय

श्राद्ध कुतप काल (पूर्वाह्न-मध्याह्न) में किया जाता है।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • पिंडदान का शास्त्रीय तीर्थ गया (बिहार) है।

  • नए क्रय और मांगलिक कार्य परंपरा से नवरात्रि तक स्थगित रहते हैं।

  • प्रयागराज, काशी, रामेश्वरम् और बद्रीनाथ का ब्रह्मकपाल — गया के अलावा श्राद्ध के अन्य शास्त्रीय स्थल यही हैं।

इस पर्व के मंत्र

टिप्पणी: श्राद्ध की कुल-परंपराएँ अत्यंत भिन्न हैं — कुल-पुरोहित का मार्गदर्शन ही प्रमाण है।