
भगवान महावीर
महावीर जयंती
चौबीसवें तीर्थंकर का जन्म — अहिंसा के महान शिक्षक।
तिथि: चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
सबसे सरल शब्दों में
भगवान महावीर का जन्मदिन — जैन पथ के महान तीर्थंकर, जिन्होंने सिखाया कि किसी को न सताना — कर्म से, वचन से भी — सबसे बड़ा बल है।
कथा और उद्देश्य
वर्धमान महावीर का जन्म ईसा-पूर्व छठी शताब्दी में क्षत्रियकुंड के राजपरिवार में हुआ; तीस वर्ष की आयु में वे सत्य की खोज में महल त्यागकर निकल पड़े। वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ, और इस युग के चौबीसवें तथा अंतिम तीर्थंकर के रूप में उन्होंने दशकों उपदेश दिया।
उनके पाँच व्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह — जैन जीवन की रीढ़ बने; और उनकी अहिंसा सबसे व्यापक: किसी का अहित नहीं, क्योंकि प्रत्येक जीव में समान मूल्य की आत्मा है। गांधीजी ने जैन अहिंसा को अपने गहनतम प्रभावों में गिना।
क्या किया जाता है
रथयात्रा और दर्शन
तीर्थंकर की प्रतिमा की नगर-शोभायात्रा; मंदिरों में विशेष दर्शन।
अभिषेक
प्रतिमा का विधिवत् अभिषेक — मेरु पर देवताओं द्वारा नवजात के अभिषेक की स्मृति।
अहिंसा का आचरण
दान, गौशाला-सेवा और शुद्ध शाकाहार — शिक्षा का पालन, केवल प्रशंसा नहीं।
श्रेष्ठ समय
शोभायात्राएँ और मंदिर-कार्यक्रम प्रातः से अपराह्न तक।
सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।
जानने योग्य
महावीर और बुद्ध लगभग समकालीन थे — उसी गंगा-भूमि में।
जैन परंपरा उन्हें संस्थापक नहीं, चौबीस तीर्थंकरों में अंतिम मानती है।
यह भारत के अधिकांश भाग में सार्वजनिक अवकाश है — जैन मनाते हैं, पड़ोसी सम्मान देते हैं।