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सार्वभौम

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥

सरल उच्चारण

Sar-ve bha-van-tu su-khi-nah, sar-ve san-tu ni-raa-ma-yaah, sar-ve bhad-raa-ni pash-yan-tu, maa kash-chid duh-kha-bhaag bha-vet

Sarve bhavantu sukhinaḥ sarve santu nirāmayāḥ, sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścid duḥkha-bhāg bhavet

शांतिभक्ति

इस मंत्र के विषय में

सार्वभौम मंगलकामना — सुख, आरोग्य और कल्याण की प्रार्थना अपने लिए नहीं, बिना अपवाद हर प्राणी के लिए।

अर्थ

सब सुखी हों; सब निरोग हों; सब मंगल देखें; कोई भी दुख का भागी न हो। तीन पदों में 'सर्वे' है और चौथे में 'मा कश्चित्' — कोई नहीं; प्रार्थना घेरा छोटा खींचने से ही इनकार कर देती है। अंतिम पंक्ति सबसे गहरा कार्य करती है: केवल यह नहीं कि सबका भला हो — यह भी कि कोई भी, कहीं भी, अपवाद न रह जाए।

मंत्र कंठस्थ करें

पहली पंक्ति तब तक बोलें जब तक वह बिना पढ़े न आ जाए, फिर अगली पंक्ति जोड़कर दोनों बोलें, जब तक पूरा मंत्र अपने आप न आ जाए।

2 में से पंक्ति 1

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

Sarve bhavantu sukhinaḥ sarve santu nirāmayāḥ, sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścid duḥkha-bhāg bhavet

0अभी नहीं बोला

अगली पंक्ति से पहले ग्यारह बार का लक्ष्य रखें। जब पंक्ति बिना पढ़े आ जाए, तब आगे बढ़ें।

प्रगति केवल इसी डिवाइस पर रहती है।

कब जपें

पूजाओं और सभाओं का समापन; जन्मदिनों और नववर्ष पर प्राणिमात्र के लिए, अस्पताल के गलियारों में मौन भाव से, और जहाँ भी सद्भावना को विस्तार चाहिए।

शब्द-दर-शब्द

सर्वे भवन्तु सुखिनःsarve bhavantu sukhinaḥ
सब सुखी हों
सर्वे सन्तु निरामयाःsarve santu nirāmayāḥ
सब निरोग हों
सर्वे भद्राणि पश्यन्तुsarve bhadrāṇi paśyantu
सब मंगल देखें
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्mā kaścid duḥkha-bhāg bhavet
कोई दुख का भागी न हो

स्रोत: पारंपरिक मंगल श्लोक; प्रायः उपनिषदों के शांति-पाठों के साथ छपता है, पर किसी उपनिषद में नहीं मिलता

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥

Sarve bhavantu sukhinaḥ sarve santu nirāmayāḥ, sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścid duḥkha-bhāg bhavet

लक्ष्य
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