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Dharamkira
त्योहार पंचांग
तेजोमय प्रभामंडल में मुकुटधारी सूर्यदेव, सात अश्वों के रथ पर आकाश में — रवि वर्मा प्रेस का प्रारंभिक लिथोग्राफ।
सूर्य नारायणरवि वर्मा प्रेस, early 1900s

अग्नि और सूर्य

लोहड़ी

घोर शीत के विरुद्ध एक अलाव — गीत, तिल, और लौटता हुआ सूर्य।

पंजाब और उत्तर भारत
बुधवार, 13 जनवरी 2027

तिथि: मकर संक्रांति की पूर्व संध्या — पौष की अंतिम रात।

सबसे सरल शब्दों में

पंजाब की अलाव-रात: सब आग के चारों ओर घूमते हैं, उसमें मक्का-मूँगफली-रेवड़ी डालते हैं, दुल्ला भट्टी के गीत गाते हैं, और सूरज की वापसी का स्वागत करते हैं।

कथा और उद्देश्य

पंजाबी वर्ष की सबसे ठंडी रात को परिवार अलाव के चारों ओर एकत्र होते हैं और उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी, मक्का अर्पित करते हैं — वर्ष की पहली फ़सल अग्नि को लौटाते हुए। यह अग्नि चूल्हा भी है और वेदी भी: शीत का अंधकार गीतों में विदा होता है और सूर्य का उत्तरायण स्वागत पाता है।

लोहड़ी के गीत दुल्ला भट्टी को याद करते हैं — वह पंजाबी नायक जिसने बेची जा रही बेटियों को छुड़ाकर अपने ख़र्च से उनके विवाह कराए — 'सुंदर मुंदरिये, हो!' हर लोहड़ी आज भी उसका नाम गाती है।

क्या किया जाता है

अलाव

सूर्यास्त के बाद अग्नि प्रज्वलित; परिवार परिक्रमा करता है — तिल, गुड़, रेवड़ी, मूँगफली, मक्का अर्पित।

पहली लोहड़ी

नवविवाहिता या नवजात की पहली लोहड़ी विशेष गीतों और उपहारों से मनाई जाती है।

बोलियाँ और भांगड़ा

अग्नि के चारों ओर बोलियाँ, ढोल, गिद्धा और भांगड़ा देर रात तक।

श्रेष्ठ समय

अलाव सूर्यास्त के बाद जलता है; अर्पण ऊँची लपटों में किए जाते हैं।

सटीक मुहूर्त नगर और परंपरा अनुसार भिन्न होता है — निश्चित समय हेतु अपने स्थान का पंचांग देखें।

जानने योग्य

  • सिंधी परिवार यही रात 'लाल लोई' के रूप में मनाते हैं।

  • कहते हैं तिल और रोड़ी से बना 'तिलोड़ी', जो घिसकर 'लोहड़ी' हो गया।

  • पर्व से पहले के दिनों में बच्चे घर-घर लोहड़ी के गीत गाते और 'लोहड़ी' माँगते हैं — मिठाई, मूँगफली और अलाव की लकड़ी।

इस पर्व के मंत्र

टिप्पणी: लोहड़ी परंपरा से 13 जनवरी है; जिन वर्षों में संक्रांति 15 को हो (जैसे 2027), कुछ लोग इसे संक्रांति-पूर्व 14 को मनाते हैं।